Wednesday, September 26, 2012

४८. अध्यापन-यात्रा का प्रथम चरण

अध्यापन-यात्रा का प्रथम चरण
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तेरापंथ धर्मसंघ आचार्यकेंद्रित धर्मसंघ है |
संघ का जितना अधिक विस्तार होता है,
आचार्यों का दायित्व उतना ही बड़ा हो जाता है |
ऐसा होना आवश्यक भी है |
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जिस संघ के सदस्य अपना पूरा जीवन संघ और
संघपति के चरणों समर्पित कर देते हैं,
उनकी चिंता आचार्य न् करे तो कौन करे ?
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तेरापंथ की विकास यात्रा में इसके आचार्यों की
दूरदर्शितापूर्ण सूझ-बूझ, साहस और सत्पुरुषार्थ की त्रिपदी
प्रकाशस्तंभ बनकर पथ प्रशस्त करती रही है |
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पूज्य गुरुदेव कालूगणी की दृष्टि अत्यंत सूक्ष्म,
सुदूर भविष्य तक झाँकने वाली थी |
एक दिन गुरुदेव ने मुझे अपने निकट बुलाकर
असीम वात्सल्य उंडेलते हुए एक नव-दीक्षित साधू
को पढाने के लिए कहा |
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मैं उस समय मात्र १४ वर्ष का था |
मैं स्वयं पढ़ रहा था |
पढ़ने की उम्र में पढाना अटपटा-सा लगा |
मेरी अध्यापन-यात्रा का वह प्रथम चरण था |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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अध्यापन-यात्रा का प्रथम चरण
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गुरुदेव के आदेश से मैं बाल-साधुओं को पढाने लगा |
उनमें से एक मुनि सोहनलालजी की प्रारम्भ से ही कला में अच्छी रूचि थी |
मेरी निश्रा की मुखवस्त्रिकाएं इतनी कलात्मक होती थीं कि
उनके बारे में साध्वियों में चर्चा होने लगी |
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मर्यादा-महोत्सव के अवसर पर सैकड़ों साध्वियां उपस्थित रहतीं,
उस समय अनेक साध्वियां साध्वी लाडांजी से पूछती -
" तुलसीरामजी स्वामी की मुखवास्त्रिका कौन जमाते हैं ?"
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शेखावाटी में एक छोटा-सा गांव था टमकोर |
वि.स. १९८७ में वहां मुनि छबीलजी (सुधरी ) का चौमासा था |
उनकी प्रेरणा से चोरड़िया परिवार में
बालक नथमल और उसकी मां बालूजी
के मन में वैराग्य का जागरण हुआ |
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मुनि छबीलजी के साथ एक सहयोगी संत थे मुनि मूलचंदजी (बीदासर) |
मैं दीक्षित हुआ, तब से ही उनके मन में मेरा अच्छा स्थान बन गया |
जब नथमल और उसकी मां पूज्य गुरुदेव के
दर्शन करने गंगाशहर आने लगे तो मुनि मूलचंदजी बोले -
" नत्थू ! तुम गुरुदेव के दर्शन करने जा रहे हो,
वहां मुनि तुलसी के दर्शन जरुर करना |"

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से



४७. तेरापंथ में संस्कृत शिक्षा

तेरापंथ धर्मसंघ की नियति है कि 
वह युग के साथ चलता है |
युग को नया मोड़ देने की क्षमता भी उसमें है |
किन्तु वह न प्रवाह्पाती है और
न बिना किसी प्रयोजन युग से टक्कर लेने का पक्षधर है |
अनेकांतवादी दृष्टिकोण के आधार पर ही संघ में विकास के नए क्षितिज खुलते रहे हैं |
उनमें एक क्षितिज है - - शिक्षा |
पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री कालूगणी का संस्कृत-प्रेम विलक्षण था |
मैंने अपने जीवन में संस्कृत भाषा के प्रति इतनी रूचि किसी में भी नहीं देखी |
तेरापंथ धर्मसंघ में संस्कृत को पल्लवित करने का काफी श्रेय पूज्य गुरुदेव को दिया जा सकता है |

४६. कैसे पढ़ा मैंने व्याकरण ?

कैसे पढ़ा मैंने व्याकरण ?
अपने यहां छुट्टी का क्या काम ?
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गुरुदेव हम साधुओं को पढ़ाते थे |
चतुर्दशी का दिन आया |
हमने पढ़ने से अवकाश ले लिया |
गुरुदेव ने बुलाकर पूछा -
" आज पढ़ने क्यों नहीं आए ?"
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मैंने निवेदन किया -
" आज मुंहपत्ती, निसीतिया आदि धोने हैं,
इसलिए आज छुट्टी है |"
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गुरुदेव ने हमको प्रतिबोध देते हुए कहा -
" अपने यहां छुट्टी का क्या काम ?
पढ़ने के समय पढ़ो |
दिन भर समय ही समय है |
धोने का काम बाद में कर लेना |"
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हमारे पास समय नहीं था, यह बात नहीं थी |
पर हम पढ़ने से जी चुराते थे,
इसलिए छुट्टी पाने का बहाना खोजते रहते थे |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

४५. व्याकरण पढ़ने की प्रेरणा

व्याकरण पढ़ने की प्रेरणा
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पूज्य गुरुदेव का विद्दाप्रेम अपूर्व था |
वे स्वयं पढ़ने में रूचि रखते थे और
दूसरों को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे |
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गुरुदेव कहते -
तुम लोग मनोयोग से व्याकरण पढ़ो और
आगमों की गहराई में उतरो |
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व्यक्ति को व्याकरण और शब्दकोष का समुचित ज्ञान न् हो तो
१. स्वजन और श्वजन,
२. सकल और शकल,
३. सकृत और शकृत
- सामान्यतः उक्त युगलों में प्रत्येक युगल के
दोनों शब्दों का उच्चारण एक जैसा सुनाई देता है |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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व्याकरण पढ़ने की प्रेरणा
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पूज्य गुरुदेव ने हमको उक्त शब्दों का
अर्थबोध इस प्रकार कराया --

स्वजन - आत्मीयजन
श्वजन - नरकुत्ता
सकल - सम्पूर्ण
शकल - खण्ड
सकृत - एक बार
शकृत - मल
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खान-पान सब ही तजै, निश्चय मांडै मरण |
घो. चि. पू. लि. करतो रहै, जद आवै व्याकरण ||
अनुवाद -
जो विद्यार्थी खान-पान आदि सब सुविधाओं को गौण कर देता है,
पढ़ाई में पूरी तरह से अपना जीवन झोंक देता है और
घो. चि. पू. लि. करता रहता है,
वह व्याकरण पढ़ने में सफल हो सकता है |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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व्याकरण पढ़ने की प्रेरणा
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व्याकरण पढ़ना सरल काम नहीं था |
इस कारण दो-चार साधुओं के मन में निराशा आने लगी |
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यह सोचकर गुरुदेव ने व्याकरण पढ़ने का तरीका
समझाते हुए उपरोक्त पद्द सिखाया |
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गुरुदेव ने हमारे मन में नया कौतुहल पैदा कर दिया |
हमने पूछा -
गुरुदेव ! यह घो. चि. पू. लि. क्या होता हैं ?
हम इसका अर्थ नहीं समझ पाए |
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गुरुदेव यही चाहते थे कि
हमारे भीतर जिज्ञासाओं के स्रोत खुले,
हम हर नए तथ्य को समझने का प्रयास करें और
जो बात समझ में न आए, उसके बारे में पूछताछ करें |
क्योंकि ऐसा होने से ही पढ़ने में उत्साह बढ़ सकता है |
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हमारे प्रश्न को सुनकर गुरुदेव प्रसन्न होकर बोले -
घो. का अर्थ है घोखना - रट्टा लगाना
चि. का अर्थ है चितारना - दोहराना
पू. का अर्थ है पूछना - प्रश्न करना
लि. का अर्थ है लिखना - पढ़े हुए ज्ञान को लिखना |
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पूज्य गुरुदेव द्वारा प्रोत्साहन नहीं मिलता तो
व्याकरण जैसा नीरस विषय पढ़ने में मन नहीं लगता |
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आज ( सन् १९९२ ) हम जैन आगमों का गंभीर अध्ययन कर रहे हैं,
आगम संपादन का कार्य कर रहे हैं,
यह सब गुरुदेव के अनुग्रह का परिणाम है |
गुरुदेव की उस कृपा और प्रेरणा ने
हमारे संस्कृत ज्ञान की बंद खिड़कियों को खोल दिया |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

४४. नए व्याकरण का निर्माण

नए व्याकरण का निर्माण
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नए व्याकरण के निर्माण में पूज्य गुरुदेव का पूरा युग बीत गया |
पूज्य कालूगणी की प्रेरणा, संघ की नियति,
पंडितजी का योग और संतों का पुरुषार्थ --
कुल मिलाकर एक बहुत सुन्दर व्याकरण ग्रन्थ तैयार हो गया |
उसे आधार बनाकर धर्मसंघ के साधू-साध्वियां युग-युग तक अध्ययन करती रहेंगी |
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आज तेरापंथ धर्मसंघ में संस्कृत के हिमालय पर आरोहण करने के लिए
" कालूकौमुदी " रूप सोपानमार्ग का ही सहारा लिया जाता है |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

४३. आशुकविरत्न पंडित रघुनन्दनजी

आशुकविरत्न पंडित रघुनन्दनजी
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चुरू !
वहां के जैन यति रावतमलजी गुरुदेव के उपपात में आए |
यतिजी ने कहा -
आजकल चुरू में संस्कृत के एक धुरंधर विद्वान आए हुए हैं,
वे कागज़ और कलम हाथ में लिए बिना ही संस्कृत के
सौ-सौ श्लोकों की रचना कर बोल देते हैं |
उनका नाम है - -
पंडित रघुनन्दन शर्मा |
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यतिजी की बात सुनकर गुरुदेव को विस्मय तो हुआ,
पर पूरा विश्वास नहीं हुआ |
उन्होंने कहा -
यतिजी ! आप भी कैसी बात कर रहे हैं ?
आज के युग में ऐसे विलक्षण विद्वान कहां मिलते हैं ?
सूंठ का एक गांठिया लेकर पंसारी बनने वाले लोग बहुत हैं |
थोड़े से ज्ञान को प्राप्त कर अहंकार में बढ़-चढ़ कर बात करने वाले पंडित मिल जाते हैं |
किन्तु गंभीर ज्ञान रखने वाले खोजने पर भी कम ही दिखाई देते हैं |
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गुरुदेव की स्वीकृति पाकर यतिजी पंडित रघुनन्दनजी के पास जाकर बोले -
" पंडितजी ! यहां एक प्रभावशाली जैन आचार्य आए हुए हैं |
आपको उनसे मिलना चाहिए |"
पंडितजी ने उत्तर दिया -
" मैं जैन संतों के पास नहीं जाऊँगा |
जैन साधू विद्दा प्रेमी नहीं होते |
उनमें तो कोई विद्वान है नहीं,
वे विद्वानों का सम्मान भी नहीं करते |
एक बात - -
उनके बारे में यह यह भी सुनी है कि
वे स्वच्छता नहीं रखते |
न तो वे स्नान करते हैं और
न कपड़े धोते हैं |
ऐसे साधुओं के पास मैं कभी नहीं जाऊँगा |
उनके प्रति मेरे मन में कोई आकर्षण नहीं है |"
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यतिजी ने पंडितजी को समझाते हुए कहा -
" पंडितजी ! मैं आपके बारे में बहुत कुछ कहकर आया हूं |
आप वहां नहीं जायेंगे तो मैं झूठा पड़ जाऊँगा |"
पंडितजी इस शर्त पर राजी हुए कि
वे जैन साधुओं के सामने हाथ नहीं जोडेंगे और
वहां बैठेंगे भी नहीं |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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आशुकविरत्न पंडित रघुनन्दनजी
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यति रावतमलजी पंडितजी को लेकर के साथ कक्ष में प्रविष्ट हुए |
पंडितजी की आंखों पर संदेह का कुहासा था |
वे अनिमिष दृष्टि से गुरुदेव की ओर देखने लगे |
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गुरुदेव ने अमृतमयी नज़रों से उनको निहारा |
पंडितजी को मौन खड़े देखकर गुरुदेव ने
उनसे संस्कृत भाषा में कुछ प्रश्न किये |
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गुरुदेव के शब्दों ने पंडितजी पर जादू-सा कर दिया |
वे अनायास ही बद्धांजलि हो गए |
" मैं जैन साधुओं के सामने हाथ नहीं जोडूंगा |"
- पंडितजी का यह संकल्प टूट गया |
मैं वहां बैठूँगा नहीं,
यह बात भी विस्मृत हो गई |
पंडितजी गुरुदेव के सामने बैठ गए |
उन्होंने काफी देर तक बातचीत की |
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पंडितजी की भ्रान्ति दूर हो गई |
उनके मन पर इतना प्रभाव पड़ा कि
वे प्रथम बार के संपर्क से ही गुरुदेव के भक्त बन गए |
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पंडितजी के लिए वह समय प्रसाद और
विषाद की मिश्रित प्रतिक्रिया का समय था |
उन्होंने गुरुदेव के दर्शन की प्रेरणा पाकर जो कुछ कहा था,
उसके स्मरण से खिन्न वे खिन्न हो गए |
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अपनी भूल के प्रायश्चित्त स्वरुप उन्होंने
आशुकविता के रूप में 'साधुशतकम' की रचना की |
उन्होंने गुरुदेव से निवेदन किया -
" आचार्यजी ! मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत हूं |
आपके संघ में मेरा कुछ भी उपयोग हो तो
मैं अपना सौभाग्य समझूंगा |"

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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आशुकविरत्न पंडित रघुनन्दनजी
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गुरुदेव ने उनसे पूछा कि
क्या वे तेरापंथी साधुओं की ज्ञानाराधना में सहयोगी बन सकते हैं ?
उन्हें संस्कृत व्याकरण, साहित्य आदि
पढाने में अपना समय लगा सकते हैं |
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विद्यादान का सिलसिला शुरू हुआ |
उसके बाद वे प्रतिवर्ष कुछ समय लेकर
गुरुदेव की उपासना में आते और
साधू-साध्वियों को संस्कृत पढ़ाते |
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यह क्रम बहुत लंबे समय तक चला |
तेरापंथ श्रावकों की एक विशेषता है --
संघ और संघपति के प्रति समर्पण |
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उनको जब ज्ञात हो जाता है कि
अमुक व्यक्ति धर्मसंघ के लिए उपयोगी है,
वे उसे सिर-आंखों पर बिठा लेते हैं
उसके साथ वे इतना घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं कि
वह एक तरह से उनके परिवार या समाज का सदस्य बन जाता है |
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उनको गुरु का इंगित मिलना चाहिए,
फिर वे उस व्यक्ति को इतना आत्मीय बना लेते हैं कि
उसकी कठिनाई को अपनी कठिनाई मानकर
उसका हल खोज निकालते हैं |
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तेरापंथी श्रावकों की शासनभक्ति ने पूज्य गुरुदेव के
कुछ सपनों को साकार करने में सक्रिय भूमिका निभाई |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से