Wednesday, September 26, 2012

४५. व्याकरण पढ़ने की प्रेरणा

व्याकरण पढ़ने की प्रेरणा
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पूज्य गुरुदेव का विद्दाप्रेम अपूर्व था |
वे स्वयं पढ़ने में रूचि रखते थे और
दूसरों को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे |
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गुरुदेव कहते -
तुम लोग मनोयोग से व्याकरण पढ़ो और
आगमों की गहराई में उतरो |
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व्यक्ति को व्याकरण और शब्दकोष का समुचित ज्ञान न् हो तो
१. स्वजन और श्वजन,
२. सकल और शकल,
३. सकृत और शकृत
- सामान्यतः उक्त युगलों में प्रत्येक युगल के
दोनों शब्दों का उच्चारण एक जैसा सुनाई देता है |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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व्याकरण पढ़ने की प्रेरणा
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पूज्य गुरुदेव ने हमको उक्त शब्दों का
अर्थबोध इस प्रकार कराया --

स्वजन - आत्मीयजन
श्वजन - नरकुत्ता
सकल - सम्पूर्ण
शकल - खण्ड
सकृत - एक बार
शकृत - मल
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खान-पान सब ही तजै, निश्चय मांडै मरण |
घो. चि. पू. लि. करतो रहै, जद आवै व्याकरण ||
अनुवाद -
जो विद्यार्थी खान-पान आदि सब सुविधाओं को गौण कर देता है,
पढ़ाई में पूरी तरह से अपना जीवन झोंक देता है और
घो. चि. पू. लि. करता रहता है,
वह व्याकरण पढ़ने में सफल हो सकता है |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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व्याकरण पढ़ने की प्रेरणा
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व्याकरण पढ़ना सरल काम नहीं था |
इस कारण दो-चार साधुओं के मन में निराशा आने लगी |
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यह सोचकर गुरुदेव ने व्याकरण पढ़ने का तरीका
समझाते हुए उपरोक्त पद्द सिखाया |
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गुरुदेव ने हमारे मन में नया कौतुहल पैदा कर दिया |
हमने पूछा -
गुरुदेव ! यह घो. चि. पू. लि. क्या होता हैं ?
हम इसका अर्थ नहीं समझ पाए |
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गुरुदेव यही चाहते थे कि
हमारे भीतर जिज्ञासाओं के स्रोत खुले,
हम हर नए तथ्य को समझने का प्रयास करें और
जो बात समझ में न आए, उसके बारे में पूछताछ करें |
क्योंकि ऐसा होने से ही पढ़ने में उत्साह बढ़ सकता है |
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हमारे प्रश्न को सुनकर गुरुदेव प्रसन्न होकर बोले -
घो. का अर्थ है घोखना - रट्टा लगाना
चि. का अर्थ है चितारना - दोहराना
पू. का अर्थ है पूछना - प्रश्न करना
लि. का अर्थ है लिखना - पढ़े हुए ज्ञान को लिखना |
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पूज्य गुरुदेव द्वारा प्रोत्साहन नहीं मिलता तो
व्याकरण जैसा नीरस विषय पढ़ने में मन नहीं लगता |
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आज ( सन् १९९२ ) हम जैन आगमों का गंभीर अध्ययन कर रहे हैं,
आगम संपादन का कार्य कर रहे हैं,
यह सब गुरुदेव के अनुग्रह का परिणाम है |
गुरुदेव की उस कृपा और प्रेरणा ने
हमारे संस्कृत ज्ञान की बंद खिड़कियों को खोल दिया |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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