अस्वास्थ्य और गुरु-कृपा
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अस्वस्थता कष्ट का हेतु है, यह एक सामान्य बात है |
अस्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध शरीर के साथ है |
पर उससे मन भी प्रभावित होता है |
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असातवेदनीय कर्म का उदय होने से व्यक्ति अस्वस्थ बनता है |
किसी भी अशुभ कर्म का उदय हो, उससे व्यथा बढ़ सकती है |
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किन्तु गुरु का अनुग्रह प्राप्त हो तो
कष्ट की स्थिति में भी आनंद का अनुभव हो सकता है |
यह मेरा अनुभूत सत्य है |
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मैं जब कभी बीमार होता,
पूज्य गुरुदेव की कृपा इतनी अधिक स्फुरित होती कि
बार-बार बीमार होने की इच्छा जाग जाती |
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बीमारी के क्षणों में गुरुदेव इतना वात्सल्य उंडेलते कि
उसमें सराबोर होकर मैं सब कुछ भूल जाता |
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उस समय गुरुदेव कई बार मुझे अपने निकट बुलाते,
नाड़ी देखते, औषधि एवं पथ्य के बारे में निर्देश देते,
स्थिति के उतार-चढ़ाव की पूरी जानकारी लेते तथा
कई बार दिन में भी अपने पास ही सुलाते |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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अस्वास्थ्य और गुरु-कृपा
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सरदारशहर !
मेरी भूख बंद हो गई |
उपचार किया गया, पर विशेष लाभ नहीं हुआ |
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गुरुदेव ने मुझे बुलाकर पूछा -
" क्या हुआ ?"
मैंने निवेदन किया -
" कुछ दिनों से भोजन में रूचि नहीं है |"
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गुरुदेव ने अपनी तर्जनी और कनिष्ठा --
दो अँगुलियों को उलटे मिलाया |
दोनों अंगुलियां मिल गई |
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हाथ की उस मुद्रा से उन्होंने मेरे शरीर का कई स्थानों से स्पर्श किया |
उस प्रयोग से खाने की रूचि में थोड़ा अंतर आया |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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