Friday, August 24, 2012

३९ मेरी संगीत साधना

मेरी संगीत साधना
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पूज्य गुरुदेव की संगीत कला में विशेष अभिरुचि थी |
संगीत की आधुनिक विधाओं से उनका परिचय नहीं था |
उन्होंने संगीत का विधिवत प्रशिक्षण भी नहीं लिया था |
फिर भी प्राचीन रागिनियों के श्रेष्ठ संगायक थे |
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जिस समय वे गाते थे तब ऐसा प्रतीत होता था
मानो कोई अभ्यस्त संगीतज्ञ गा रहा है |
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संगीत मेरी रूचि का विषय है |
बालकपन से ही मुझे गाने में रस था |
उस समय मेरा गला साफ़ था |
राग बहुत बारीक थी |
मुझे अनुभव होता कि तत्कालीन साधुओं में
मेरा जैसा गला किसी के पास नहीं था |
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पूज्य गुरुदेव कालूगणी जब कभी गीतों का संगान करते,
मैं उनके साथ गाया करता था |
पर मेरी राग अलग ही रहती |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरी संगीत साधना
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छापर !
गुरुदेव गाते, तब मैं साथ-साथ गाता |
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कुछ भाई गुरुदेव के पास आकर बोले -
" आप रात को गाते हैं, तब आपके साथ कौन गाता है ?
एक बहुत बारीक स्वर, बांसुरी जैसा स्वर दूर-दूर तक सुनाई देता है |"
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उस समय वास्तव में ही मेरे गले से बहुत बारीक स्वर निकलते थे |
यह स्थिति दो-तीन वर्षों तक रही |
राग को बहुत ऊंची उठाने पर भी स्वर भंग नहीं होता था |
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छापर के नाहटा बंधुओं के बारे में एक बात प्रसिद्ध थी कि
उनकी नज़र बहुत जल्दी लगती है |
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मुझे कुछ संतों ने परामर्श दिया -
" तुलसी मुनि ! तुम् यहां गाना बंद कर दो |
इतना सुन्दर गाते हो कि नज़र लग जायेगी |"
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मैंने उनसे कहा -
" आप चिंता न करें |
मुझे नज़र नहीं लगेगी |
क्योंकि मैं गुरुदेव के साये में रहता हूं |
गुरु का साया सबसे बड़ा सुरक्षा-कवच है |"

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरी संगीत साधना
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गुरुदेव की कृपा से मैं बहुत मधुर स्वर में गाता था,
इस कारण कुछ व्यक्ति मुझे
" बंसरी महाराज " कहकर पुकारते थे |
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मैं बाल साधुओं को पढाता था,
इसलिए कुछ लोग मुझे
" मास्टर महाराज " कहते थे |
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मेरा प्रत्येक काम कलात्मक था,
रहन-सहन व्यवस्थित था,
परिधान ठीक था,
इस दृष्टि से कुछ लोगों में मेरी पहचान
" शौक़ीन महाराज " इस नाम से हो गई |
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भगवान महावीर के तीन नाम थे --
वर्धमान,
सन्मति और
महावीर |
ये तीनों नाम सार्थक थे |
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इसी प्रकार उस समय मेरी गतिविधियों के आधार पर लोगों द्वारा
मैं भी तीन नामों से पुकारा जाने लगा |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

३८. गुरु चरणों में स्वाध्याय

गुरु चरणों में स्वाध्याय
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रात्रि के समय मैं मुनि कुन्दनमलजी के पास सोया करता था |
गुरुदेव ने मुनि चम्पालालजी से कहा -
" चम्पालाल ! तुलछु अभी टाबर है |
आजकल सर्दी का समय है |
रात को उसके कपड़े इधर-उधर हो जाते होंगे |
तुम् उसका ध्यान रखा करो |
एक-दो बार संभाल लिया करो |"
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एक मां अपने अबोध बच्चे का जितना ध्यान रखती है,
उससे भी अधिक मेरा ध्यान रखा गया |
गुरु का वह असीम अनुग्रह मेरे निर्माण का मुख्य आधार था |
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शीतकाल की रातें लंबी होती है |
गुरुदेव चाहते थे कि हम उनका भलीभांति उपयोग करें |
इस दृष्टि से उनका निर्देश था कि
प्रातः जल्दी उठकर स्वाध्याय करना चाहिए |
पर हमारे लिए जल्दी उठाना महाभारत था |
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गुरुदेव कई बार कहते थे -
" रातें कितनी भी बड़ी हों,
बाल साधुओं की नींद उनसे भी बड़ी है |"
हमारी नींद कभी पूरी होती ही नहीं |
इसलिए जल्दी उठकर स्वाध्याय करने की बात
शुरू-शुरू में हमें अच्छी नहीं लगती थी |
फिर भी चार-साढे चार बजे उठने के लिए सायरन बजने लगता |
मुनि शिवराजजी द्वारा एक-दो बार जगाए जाने के बाद
हम छोटे साधू गुरुदेव के चरणों में जाकर बैठते और स्वाध्याय करते |
मैं स्वाध्याय करते-करते ऊंघने लगता |
तब गुरुदेव कहते -
" तुलसी ! खड़े हो जाओ |"
खड़े होने के बाद भी कभी नींद आने लगती |
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उस स्थिति में मुझे निर्देश मिलता -
" तुलसी ! बाहर बरामदे में जाओ |
आसमान में तारे हैं या नहीं ? देखकर आओ |"
देह को ठिठुराने वाली सर्दी में कमरे से बाहर
छपरे या बरामदे में जाना रुचिकर नहीं लगता |
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पर गुरुदेव के आदेश का पालन जरुरी था |
इसलिए बाहर घूमकर ऊंघ उड़ाकर पुनः आता |
आज उन बातों को स्मरण करता हूं तो मन में आता है कि
पूज्य गुरुदेव ने मेरा निर्माण करने के लिए कितना श्रम किया |
उस समय आप इतना ध्यान नहीं देते
तो पता नहीं मैं आज कहां होता ?
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दीक्षा के दो वर्षों बाद मेरा सोना और बैठना प्रायः गुरुदेव के पास होने लगा |
तब तक चार बजे उठने का क्रम व्यवस्थित हो गया |
कभी-कभी आप कहते -
" तुलसी ! तू रात में बड़ी अच्छी नींद लेता है |
आज तो तुमने पूरी रात करवट ही नहीं बदली |
जितनी बार तुझे देखा, तू एक ही पार्श्व में सोया था |"
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वे बचपन के दिन !
पूज्य गुरुदेव का वह साया !
जीवन में पूरी निश्चिन्तता थी |
आनंद ही आनंद था |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

३७. ज्ञान का यात्रा का प्रथम चरण

ज्ञानयात्रा का प्रथम चरण -
पूज्य गुरुदेव मेरे प्रेरणा स्रोत थे |
मैं जो कुछ पाया है, उनकी कृपा से पाया है |
अनेक साधू-साध्वियों का मेरे प्रति जो आकर्षण बढ़ा,
उसका एक कारण गुरुदेव का अनुग्रह था |
आप अपने दायित्व के प्रति बहुत सजग थे |
जिस समय जो काम उनके जिम्मे रहा,
उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ वह काम किया |
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आचार्य पद का दायित्व सँभालने के बाद
उनके कार्यक्रमों में एक महत्वपूर्ण काम था -
बाल साधुओं का निर्माण | गुरुदेव मेरी प्रत्येक गतिविधि के नियंता थे |
मुझे किस समय क्या करना है ?
अध्ययन किन ग्रंथों का करना है ?
कब पढ़ना है ?
और कब सीखना है ?
किन ग्रंथो को कंठस्थ करना है ?
कब व्याख्यान देना है ?
कब लिखने का अभ्यास करना है ?
कब और किसे पढ़ाना है ?
इत्यादि सभी गतिविधियों के लिए समय-समय पर
गुरुदेव से मार्गदर्शन मिलता रहता था |
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इसलिए मुझे अपने बारे में कभी किसी प्रकार की चिंता नहीं करनी पड़ी |
गुरुदेव का दृष्टिकोण था कि
बचपन में अधिक समझने की स्थिति नहीं होती |
उस समय कंठस्थ करने में सुविधा रहती है |
इसी कारण गुरुदेव ने कंठस्थ ज्ञान पर बल दिया |
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उस समय पुस्तकें कम उपलब्ध होती थीं,
इसलिए हम हस्तलिखित प्रतियों का बोझ उठाते थे |
गुरुदेव के निर्देश से जो ग्रन्थ याद करते,
उसकी प्रति मिल जाटी तो उसे अपने पास रख लेते |
अन्यथा लिखकर नई प्रति तैयार कर लेते |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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ज्ञानयात्रा का प्रथम चरण
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ग्यारह वर्षों की उस संक्षिप्त यात्रा का प्रमुख विवरण अग्रांकित है :--
* दीक्षा का प्रथम वर्ष - दशवैकालिक, सिन्दूरप्रकर, भक्तामर स्तोत्र,
अभिधानचिंतामणि शब्दकोष आदि |
* दीक्षा का दूसरा वर्ष - भ्रमविध्वंसन के सूत्रपाठ आदि |
* दीक्षा का तीसरा, चौथा वर्ष - सिद्धांतचन्द्रिका आदि |
* दीक्षा का पांचवां वर्ष - प्रमाणनयतत्व लोकालंकार, षड्दर्शन आदि |( रात्रिकालीन उपदेश )
* दीक्षा का छठा वर्ष - गणरत्न महोदधि आदि |
* दीक्षा का सातवाँ वर्ष - भिक्षुशब्दानुशासन के सूत्र | ( बृहदवृत्ति का अध्ययन )
* दीक्षा का आठवाँ वर्ष - आचार्य सिद्धसेनदिवाकर विरचित कल्याणस्तोत्र के द्वितीय चरण को लेकर समस्यापूर्ति के रूप में कालूकल्याण-मंदिर नामक संस्कृत काव्य की रचना |( मध्यान्ह में हरिवंश का व्याख्यान )
* दीक्षा का नौवां वर्ष - भ्रमविध्वंसन निर्युक्ति सहित, शांतिनाथ महाकाव्य और षड्दर्शनसमुच्चय की हरिभद्रसुरि लिखित टीका का वाचन, कालूकौमुदी का अध्यापन तथा राम चरित्र का कंठीकरण | ( मध्यान्हकालीन व्याख्यान
* दीक्षा का दसवां वर्ष - हेमशब्दानुशासन व्याकरण का आठवाँ अध्याय ( प्राकृत व्याकरण ) उणादि पाठ, धातु पाठ आदि |
* दीक्षा का ग्यारहवां वर्ष - मालवा यात्रा में मध्यान्ह एवं रात्रि में व्याख्यान | गंगापुर चातुर्मास्य में सावन महीने से रामचरित्र का वाचन |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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ज्ञानयात्रा का प्रथम चरण
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जब मैं विद्यार्थी था,
तभी से गुरुदेव ने साधुओं को पढाने का दायित्व दे दिया |
मुझे अनुभव हुआ कि गुरुदेव जिस व्यक्ति का विश्वास करते,
पूरा करते |
अध्यापन के मामले में उन्होंने मेरा जितना विश्वास किया,
उससे मैं स्वयं चकित था |
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मेरे लिए वह सहज रूप में विकास का पथ
प्रशस्त करने वाला प्रयोग सिद्ध हुआ |
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राजस्थान में एक कहावत है -
" ज्ञान कंठा दाम अंटां "
पैसा पास में हो तो वांछित वस्तु का क्रय किया जा सकता है |
इसी प्रकार ज्ञान कंठस्थ हो तो उसका
यथेष्ट उपयोग करने से कहीं भी रुकावट नहीं होती |
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महावीर-निर्वाण की एक सहस्राब्दी तक
जैन आगम कंठस्थ परम्परा से ही सुरक्षित रहे थे |
गुरुदेव इस पर बहुत बल देते थे |
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इसी कारण आगम, दर्शन, साहित्य, व्याकरण, शब्दकोष, थोकड़े,
व्याख्यान आदि कंठाग्र करने में मेरी अभिरुचि बनी रही |
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अपने विद्यार्थी जीवन के ग्यारह वर्षों में लगभग २०००० श्लोक
परिमित ग्रन्थ याद करवा कर गुरुदेव ने मुझपर बहुत उपकार किया |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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ज्ञानयात्रा का प्रथम चरण -
कंप्यूटर और केलकुलेटर के इस युग में
नई पीढ़ी के साधू-साध्वियों को सीखने और
नियमित स्वाध्याय की प्रेरणा मिले,
इस दृष्टि से मेरे द्वारा कंठस्थ किए गए
ग्रंथों की सूची दी जा रही है -
१. आगम
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आवश्यक
दशवैकालिक
उत्तराध्ययन
नन्दी
बृहत्कल्प
आयारो
प्रश्नव्याकरण ( संवरद्वार )
२. तात्विक ग्रन्थ
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पचीस बोल
पानां री चरचा
पचीस बोल री चरचा
तेरा द्वार
बासठियो
कर्म प्रकृति
गतागत
अल्पाबोत
संजया
नियंठा
कायस्थिति
लघुदंडक
बावनबोल
गमा
विरह्द्वार
सीझै द्ववार
बंधी शतक
भ्रमविध्वंसन
३. चौपी आदि ( विस्तृत विवरण उपलब्ध है )
४. व्याख्यान आदि ( विस्तृत विवरण उपलब्ध है )
५. संस्कृत ग्रन्थ ( विस्तृत विवरण उपलब्ध है )

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से