Friday, August 24, 2012

३२. मेरी दीक्षा का उत्सव

मेरी दीक्षा का उत्सव - १
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पूर्णिमा ( ३० नवंबर १९२५, सोमवार ) और पंचमी ( ५ दिसंबर १९२५, शनिवार )
के बीच में केवल चार दिन थे |
पूर्णिमा को साथ मिलाने पर दीक्षा में पांच दिन शेष बचे थे |
उन दिनों में बहुत सारे काम निपटाने थे |
घर में मेहमान आने लगे | जो लोग बाहर से आते, वे मेरे पास बैठना चाहते |
किन्तु समय इतना कम रहा कि मैं किसी की इच्छा पूरी नहीं कर सका |
परिजनों और परिचितों के घरों में जाने का सिलसिला शुरू हुआ तो वह चलता ही रहा |
घर-घर में जाना, घरवालों के हाथ से ग्रास लेना, खोल भराना, चांदी के गोलिए बांटना, एक-एक व्यक्ति को प्रत्याख्यान कराना आदि प्रतिदिन के काम थे |
सब काम होते गए | लाडकोड में दिन बीतते गए |
उसके बीच वरनौले निकाले गए |
एक वरनौला घर का, एक ननिहाल का और एक समाज की ओर से बड़ा वरनौला |
वरनौलों की व्यवस्था का दायित्व कुंदनमलजी खटेड़ पर था |
वे उस काम में पुरे दक्ष माने जाते थे |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरी दीक्षा का उत्सव - २
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दीक्षा का आदेश मिलने के बाद मैं बहुत प्रसन्न था |
मैंने सहजभाव से पूज्य कालूगणी का शिष्य बनने का सपना संजोया था |
मेरा सपना इतना शीघ्र साकार हो जाएगा, यह मुझे कल्पना ही नहीं थी |
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मेरा भाग्य प्रबल था,
इसलिए पुरुषार्थ किये बिना ही मैं अपनी मंजिल के निकट पहुंच गया |
आश्चर्य और प्रसन्नता भरे उस वातावरण में
मेरे समवयस्क कुछ किशोर यह सोचते थे कि
किसी तरह मेरी दीक्षा टल जाए |
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उन किशोरों में दो नाम मुझे याद है -
मूलचंद बैद (लाडनूं) और शुभकरण दसानी (सुजानगढ़) |
उन दोनों ने मिलकर एक योजना बनाई |
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उनका चिंतन था -
यह लड़का बुद्धिमान लगता है |
अभी पढ़ाई छोड़कर साधू बन जाएगा तो इसका विकास ठप्प हो जाएगा |
इसकी मां इस बात को समझ नहीं सकती |
हम लोग इसे समझाने की कोशिश करें |
यदि हम सफल हो गए तो इसको पढ़ने की प्रेरणा देंगे |
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उस समय उन दोनों किशोरों से मेरा परिचय नहीं था |
दीक्षा लेने के बाद पता चला कि
वे दोनों पढ़ाई में तेज हैं और आधुनिक विचारधारा से प्रभावित हैं |
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उन्होंने मुझे समझाने का प्रयास किया होगा,
मुझे ऐसी कोई बात याद नहीं है |
उन दिनों मेरा मन दीक्षा की मधुर कल्पनाओं में ही खोया रहता था |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरी दीक्षा का उत्सव -  ३ 
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दीक्षा का दिन निश्चित होते ही घर में उत्सव का माहौल हो गया |
घर में क्या-क्या होता, उससे मुझे कोई सरोकार नहीं था |
फिर भी एक बात ने मेरे मन को आकृष्ट किया |
उन दिनों परिवार तथा पास-पड़ोस की बहनें एक स्वर से बैरागी के गीत गाती थीं |
कुछ गीत शिक्षाप्रद होते और कुछ पारंपरिक |
उनके बोल बहुत अच्छे लगते |
कभी-कभी तो मैं सब कुछ भूलकर उन गीतों में खो जाता |
कुछ गीत आज भी मेरी स्मृति में थिरक रहे हैं :-
* म्हारै नान्है-सै वैरागी नै वैराग लागै प्यारो |
   म्हारै छोटै-सै वैरागी नै वैराग लागै प्यारो ||
   वैराग लागै प्यारो, संसार लागै खारो, म्हारै ..||
   दादोसा लागै खारा, गुरुदेव लागै प्यारा, म्हारै ..||
   घर-बार लागै खारो, संजम लागै है प्यारो, म्हारै ..||
* ऊभा हो वैरागी दादोसा री पोल, हो वैरागी ..|
   कोई लिखद्दो दादोसा ! वैरागी नै आगन्या जी राज |
   आगन्या वैरागी ! लिखीयै न जाय, हो वैरागी ..||
   कोई छाती छलीजै हिवड़ो ओलरै जी राज ||
   छाती दादोसा ! काठी कर राख, अब काठी ..|
   कोई हिवड़ो जड़ाल्यो म्हारासा रै ज्ञान सूं जी राज ||
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से




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