Friday, August 24, 2012

१०. बचपन

बचपन 
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बदलती जीवन शैली और बढते संचार-साधनों ने बच्चों का बचपन छीन लिया |
आज के बच्चे सिनेमा, दूरदर्शन आदि के द्वारा इतना अधिक जान लेते हैं कि
खाने-खेलने के दिनों में वे सोचने लग जाते हैं |
उनके खिलौने की शक्लें बदल गयी है,
खेल के तरीके बदल गए हैं
और जीने का परिवेश भी बदल गया है |
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मैं जब बच्चा था, 
मेरे सामने मेरी मां से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं था |
उस समय घर की आर्थिक स्थिति साधारण हो गई थी |
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बच्चों को वार-त्यौहार दूध पिलाया जाता था |
हमने कभी जाना ही नहीं कि
दूध प्रतिदिन पीने का पेय होता है |
उपवास के पहले दिन या पारणे में भी दूध मिलता था |
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प्रातराश में हम दलिया-रोटी, दही-रोटी आदि पदार्थ लेते थे |
मां के ममतामय हाथों से परोसा गया 
वह दलिया भी हमें बहुत अच्छा लगता था |
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अधिक लाड़-प्यार के कारण या नैसर्गिक रूप से ही 
मुझे थोड़ी प्रतिकूलता होते ही गुस्सा आ जाता था |
कभी-कभी गुस्सा इतना तेज होता कि 
मैं एक या दो समय खाना भी नहीं खाता |
अनेक वर्षों तक इस प्रवृत्ति से मुझे छुटकारा नहीं मिला |
मैं बचपन से ही स्वच्छता का प्रेमी था |
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बचपन में मेरी आंखें बहुत दुखती थी |
अनेक तरह के घरेलु उपचार किये जाते |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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