Friday, August 24, 2012

६. मेरी मां


मेरी मां का नाम था वदना |
उन्हें वन्दनकुंवर नाम से पुकारा जाता था |
वे लाडनूं निवासी पूनमचन्दजी कोठारी की पुत्री थी |
मां का जन्म शरद ऋतू और नवरात्र के समय हुआ |
उनका जीवन शरद जैसा साफ़-सुथरा था |
सहजता, सरलता, आत्मीयता, मिलनसारिता, वचनमाधुर्य, कर्मठता, सेवाभावना, गृहकार्यों में दक्षता आदि विशेषताओं का प्रतिबिम्ब उनके व्यवहार में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता था |
उनकी शादी १४ वर्ष की उम्र में झूमरमलजी खटेड़ के साथ हुआ |
वह युग स्त्री शिक्षा की दृष्टि से अनुकूल नहीं था |
लड़की को पढ़कर कमाई करनी है क्या ?
एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती |
एक घर में दो कलमें नहीं चल सकती |
- ऐसी जनश्रुतियां भी प्रचलित थी |
मेरे पिता के साथ सामंजस्य बिठाने में मां को कोई कठिनाई नहीं हुई |
परिवार में छोटी बहु होने पर भी दादाजी को सबसे अधिक भरोसा मां का था |
मां के हम नौ संतानें थीं -
छह भाई और तीन बहनें |
बच्चों के संस्कार-निर्माण के कार्य में पूरी दक्ष थीं |
सूर्योदय से पहले ही वे प्रभाती गाकर हमें जगा देती थीं |
गीत के बोल इस प्रकार है -
" उठो रे म्हांरा टाबर-टोली, गयो अंधेरो रात को |
पाड़ोसी घर वाला आया, लोटो भर्दयो छाछ को ||"
आंखों में नींद होती, फिर भी हम उठकर बैठ जाते |
पानी का अपव्यय न हो, इस दृष्टि से मां हमें बराबर सचेत करती रहती थीं |
नाश्ता मांगने पर वे कहतीं -
नाश्ता तैयार हो रहा है,
तब तक तुम साध्वियों के दर्शन करके आ जाओ |
इस प्रकार नाश्ते से पहले संत-दर्शन की आदत बन गई |

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