मेरे परिवार का आर्थिक परिवेश
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जब मैं २ वर्ष का हुआ तब मेरे दादाजी का स्वर्गवास हो गया |
मेरे जीवन का पांचवां वर्ष ऐसा आया, जब पिताजी झूमरमल जी का साया सिर से उठ गया |
दादाजी और पिताजी के चले जाने से घर की आर्थिक स्थिति नाजुक हो गई |
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मेरे जीवन का पांचवां वर्ष ऐसा आया, जब पिताजी झूमरमल जी का साया सिर से उठ गया |
दादाजी और पिताजी के चले जाने से घर की आर्थिक स्थिति नाजुक हो गई |
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कमाई करनेवाले दो भाई थे -
मोहनलालजी और खींवराजजी |
मोहनलालजी सिराजगंज में मुनीम का काम करते थे |
खींवराजजी फारबीसगंज में नौकरी करते थे |
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मोहनलालजी और खींवराजजी |
मोहनलालजी सिराजगंज में मुनीम का काम करते थे |
खींवराजजी फारबीसगंज में नौकरी करते थे |
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मां गृह सञ्चालन में कुशल थी |
मितव्ययिता और व्यवहार-कुशलता -
इन दो विशेषताओं के कारण न् कभी दो पैसे की चीज का दुरूपयोग किया और
न् कभी बच्चों को कोताही प्रकट होने दी |
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मितव्ययिता और व्यवहार-कुशलता -
इन दो विशेषताओं के कारण न् कभी दो पैसे की चीज का दुरूपयोग किया और
न् कभी बच्चों को कोताही प्रकट होने दी |
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मकान निजी था, इसलिए उसका कोई खर्च नहीं था |
धान-पात, घी-तेल, मिर्च-मसाला, इंधन-पानी, कपड़े-लत्ते आदि ऐसी चीजें थीं,
जिनमें से किसी को छोडना संभव नहीं था |
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धान-पात, घी-तेल, मिर्च-मसाला, इंधन-पानी, कपड़े-लत्ते आदि ऐसी चीजें थीं,
जिनमें से किसी को छोडना संभव नहीं था |
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पढ़ाई की फीस, समय-समय पर बहन-बेटियों को बुलाना आवश्यक था |
गणित की जोड़-बाकी न सीखने पर भी मां पाई-पाई का हिसाब अँगुलियों पर रखती थी |
उनके हिसाब में पांच पैसे का भी अंतर नहीं आया |
गणित की जोड़-बाकी न सीखने पर भी मां पाई-पाई का हिसाब अँगुलियों पर रखती थी |
उनके हिसाब में पांच पैसे का भी अंतर नहीं आया |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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