Friday, August 24, 2012

१४. मेरा बचपन - सत्य-निष्ठा

मेरा बचपन - सत्य-निष्ठा 
--------------------------
एक बार मेरी बड़ी भाभी ( मोहनलालजी की पत्नी ) ने मुझे दो आने देते हुए कहा -
" मोती ! ( राजस्थान में देवर के लिए मोती प्रयुक्त होता है )
ये पैसे ले जाओ और बाजार से कीलें ला दो |"
मैंने मामाजी की दूकान से कीलें ली,
पर उन्होंने पैसे नहीं लिए |
घर पर भाभी को कीलें दे दी और २ आने अपने पास रख लिए |
किन्तु मन में एक प्रतिक्रया हुई -
जरूरत हो तो पैसे मांग सकता हूं,
पर इस प्रकार बिना बताए पैसा रखना अच्छी बात नहीं है |
मैंने तत्काल भाभी के पास जाकर पैसे उन्हें लौटा दिए |
भाभी ने पूछा -
" पैसे क्यों वापस करते हो ?"
मैंने कहा -
" मामाजी की दुकान से कीलें खरीदी थी |
उन्होंने पैसे लिए नहीं |"
भाभी बोली -
" मेरे देवरजी बहुत सयाने हैं |"
यह बात सुनकर मैं मन ही मन बहुत प्रसन्न हुआ |
इस घटना ने सत्य के प्रति मेरी निष्ठा को और भी मज़बूत कर दिया |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

No comments:

Post a Comment