Friday, August 24, 2012

२६ . ओजस्वी आभामण्डल का आकर्षण

ओजस्वी आभामण्डल का आकर्षण
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पूजी म्हाराज ( आचार्य श्री कालूगणी )
मिगसर महीने में लाडनूं पधारे |
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उनकी मुखमुद्रा देखकर मेरे चेहरे पर 
अज्ञात हर्ष की रेखा खिंच जाती |
मैं कुछ जानता नहीं था,
पर उन्हें देखने से सहज प्रसन्नता का अनुभव होता |
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उनके मुखारबिंद में ऐसा कोई आकर्षण था कि 
चाहकर भी वहां से आंखें नहीं हटा पाता |
उनका ललाट इतना चमकता था मानो
पुण्यवत्ता पुंजीभूत हो गई हो |
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उनका चलना, बैठना, प्रवचन बातचीत करने का 
तरीका आदि सब कुछ मुझे अच्छा लगता था |
उन दिनों घर में मेरा मन ही नहीं लगता |
अवसर मिलते ही मैं पूजी म्हाराज के प्रवास-स्थल पहुंच जाता |
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वहां उनके निकट जाने की हिम्मत मुझमें नहीं थी |
मैं मुख्यद्वार के पास खड़ा हो जाता |
मैं उनकी ओर अनिमेष देखता रहता |
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गेट के पास खड़े रहने और पूजी म्हाराज को 
देखने में जिस आनंद का अनुभव होता,
उसे मैं शब्दों में अभिव्यक्ति नहीं दे सकता |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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