Friday, August 24, 2012

२८. मेरा वैराग्य

मेरा वैराग्य
वि.स.१९८२ (सन् १९२५ ),
लाडनूं !
यह वर्ष मेरे भाग्योदय का वर्ष था |
मेरे भाग्यविधाता पूज्य गुरुदेव कालूगणी लाडनूं पधारे |
जिस दिन उन्होंने लाडनूं की धरती पर चरण टिकाये,
उन्हें आशा नहीं थी कि
वहां कोई किशोर दीक्षा लेने के लिए तैयार होगा |
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दीक्षा क्या होती है ?
वैराग्य क्या होता है ?
दीक्षा लेकर क्या करना होता है ?
इन प्रश्नों का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था |
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मेरी आंखों के सामने एक ही छवि थी |
एक क्षण के लिए भी मैं उसे भूल नहीं पाता था |
मेरी एक ही भावना थी कि
मैं गुरुदेव के उपपात में रहूँ |
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मैंने मां से दो-चार बातें कीं |
उनके कथन से यह समझ में आया कि
गुरुदेव का शिष्य बनना कोई सरल काम नहीं है |
विशिष्ट भाग्यशाली व्यक्ति ही उनका शिष्य होने की अर्हता पा सकता है |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरा वैराग्य - २
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मैं एक दोराहे पर खड़ा था |
एक और गुरुदेव के चरणों में रहने की उत्कट अभिलाषा,
दूसरी ओर उनके पास पहुँचने और रहने की प्रक्रिया का अज्ञान |
मागदर्शन लूं तो किससे ?
कुछ पूछूं तो किससे ?
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इस कशमकश के बीच मैं सहज भाव से गुरुदेव के प्रवास स्थल पर गया |
संयोग की बात,
मुनि चम्पालालजी अकेले मिल गए |
वे मेरे बड़े भाई थे |
पर मैं उनसे अधिक बात नहीं करता था |
उस दिन उन्होंने बहुत धीरे से पूछा -
" तुलसी ! तुम् दीक्षा लोगे क्या ?"
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मुझे इस प्रकार के प्रश्न का सामना करना पड़ेगा,
ऐसा कभी सोचा ही नहीं था |
किन्तु एक क्षण भी चिंतन किये बिना मैंने सहज भाव से उत्तर दिया -
हां ! मेरा मन है |
मेरे इस छोटे-से वाक्य ने उनको उत्साहित कर दिया |
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मेरा वैराग्य निरंतर बढ़ता रहे,
इस दृष्टि से वे मुझे चित्रों से, संसार की असारता से और
सीखने-चितारने की प्रेरणा देते |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरा वैराग्य - ३
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एक दिन मुनि चम्पालालजी मुझे मुनि मगनलालजी के पास ले गए |
उस युग में दीक्षा लेने के इच्छुक मुमुक्षु भाई-बहनों का वहां जाना आवश्यक था |
उनकी पारखी नज़रों में चढ़ने के बाद वे मुझे पूज्य गुरुदेव कालूगणी के पास लेकर गए |
उनका ( गुरुदेव ) कुछ क्षणों का निकट सानिध्य मुझे अभिभूत कर गया |
उन्होंने मेरे साथ थोड़ी-सी बात की |
मैं निहाल हो गया |
गुरुदेव ने मुझे सिखाने की जिम्मेदारी कुछ संतों को दी |
वे मुझे पूरी जागरुकता से सिखाने लगे |
मैंने कुछ ही दिनों में प्रतिक्रमण आदि आवश्यक चीजें कंठस्थ करके सूना दीं |
मेरी एकाग्रता और सीखने की लगन देखकर अन्य साधू भी मेरे प्रति असीम वात्सल्य रखते थे |

मुनि चंपालालजी की इच्छा थी कि गुरुदेव के उसी प्रवासकाल में मेरी दीक्षा हो जाए |
मैं भी जल्दी से जल्दी गुरुदेव के चरणों में जाने के लिए उत्सुक था |
इस विषय में मैंने एक दिन मां के सामने अपना मन खोलते हुए कहा -
" मां ! मैं साधू बनना चाहता हूं |"
मेरी बात सुन मां न चौंकी और न उसे किसी विलक्षणता का अनुभव हुआ |
वह सहज भाव से बोली -
" बेटा ! साधू बनना बहुत अच्छी बात है,
पर काम कठिन है | तू अभी टाबर है | अच्छी तरह सोच ले | मन पक्का हो तो आगे बात करना |
अन्यथा लोगों में हंसी हो जायेगी |
वैसे मैं इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कह सकती |
मूणू ( मोहन ) जैसा कहेगा, वैसा होगा |
मोहनलालजी हम भाई-बहनों में सबसे बड़े थे |
हमारे पुरे परिवार का दायित्व उन पर था |
वे उस समय सिराजगंज में थे |
मां के मन में धर्म की लगन सदा से थी |
किन्तु वे किसी प्रकार की जिम्मेवारी लेने के लिए तैयार नहीं थी |
इसका कारण भी था |
भाई मोहनलालजी बहुत कड़े और खरे थे |
जब तक उनके दिमाग में कोई बात नहीं बैठती,
वे उससे सहमत नहीं होते थे |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरा वैराग्य - ४
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इधर मेरा वैराग्य पुष्ट हो रहा था,
उधर गुरुदेव के प्रवास के दिन कम हो रहे थे |
एक बार मैं मां के साथ मुनि चम्पालालजी की उपासना कर रहा था |
दीक्षा का प्रसंग चल पड़ा |
उस समय वे हम दोनों को मुनि मगनलालजी के पास ले गए |
उन्होंने मां से थोड़ी बात की |
फिर उन्होंने हमें गुरुदेव के दर्शन कराए |
गुरुदेव ने पूछा -
" मोहन कहां है ?
वह कब तक आएगा ?"
मां बोली - " वह सिराजगंज रहता है | अभी उसके आने की कोई बात नहीं है |"
अब चिंतनीय बिंदु यह रहा कि मोहनलालजी को लाडनूं कैसे बुलाया जाए ?
मेरी दीक्षा की सम्भावना के आधार पर उनको लाडनूं बुलाना संभव नहीं था |
मेरे मन में पूज्य गुरुदेव के प्रति प्रगाढ़ आकर्षण था |
वह क्यों था ?
मैं नहीं जानता |
मुझे ऐसा लगा कि गुरुदेव के मन में भी मेरे प्रति कोई आकर्षण है |
उसका कारण भी मैं नहीं जान पाया |
पूज्य गुरुदेव की मुझ पर पूर्ण कृपा दृष्टि थी |
जिस दिन मुनि मगनलालजी ने मुझे उनके चरणों तक पहुँचाया और मेरा परिचय करवाया,
उसी दिन से उनकी दृष्टि इतनी करुणामयी हो गई कि
मैं उसे कभी विस्मृत नहीं कर पाया |

दीक्षा के लिए तीव्र भावना, मुनि चम्पालालजी की प्रेरणा और मुनि मगनलालजी
के प्रोत्साहन से लाडनूं में अपने आप ही दीक्षा का अनुकूल वातावरण बनने लगा |
उन्हीं दिनों एक दिन मां बोली -
" तुलसी ! तू साधू बनने की बात कर रहा है | इसकी मुझे प्रसन्नता है |
मेरी भी यही इच्छा है | तू अपने साथ मुझे भी ले ले |"
मां की बात सुनकर मैं घबराया |
मैंने सोचा -
इनके कारण मेरी दीक्षा में कोई व्यवधान आ गया तो मैं क्या करूंगा ?
मां के उपकार को अनदेखा कर मैं बोला -
" मां ! आपकी अवस्था है | आप घर की अधिकारिणी हैं |
आपके लिए बहुत बातें सोचनी पड़ेगी |
अभी यह झंझट शुरू हो गया तो मेरी दीक्षा खटाई में पड़ जायेगी |
इस समय तो आप मुझे आज्ञा दिला दें |"
मां की अनौपचारिक आज्ञा मुझे मिल चुकी थी |
किन्तु वे मोहनलालजी की सहमति के बिना कुछ भी करने को तैयार नहीं थीं |
इस दृष्टि से जो व्यक्ति चिंतन कर रहे थे,
उन्हें एक उपाय सूझा कि बहन लाड की दीक्षा के नाम से
मोहनलालजी को लाडनूं बुलाया जा सकता है |
इसके लिए मोहनलालजी को लाडनूं बुलाने के लिए पृथ्वीराजजी बरमेचा ने तार देकर सूचित किया
कि पूज्य कालूगणी लाडनूं प्रवास कर रहे हैं |
लाडबाई की दीक्षा हो सकती है |
इसलिए वे एक बार अतिशीघ्र लाडनूं आ जाएं |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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