Friday, August 24, 2012

१८ . मेरा विद्यालय - जैनत्व के संस्कार

मेरा विद्यालय - जैनत्व के संस्कार 
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मैं जहां पढ़ा, वह जैन स्कूल था |
पढानेवाले अध्यापक भी जैन थे |
इसलिए णमोक्कार मन्त्र आदि कुछ 
तात्विक सूत्र पढ़ाई के साथ ही सिखा दिए गए |
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स्कूल की एक लाइब्रेरी भी थे |
उसमें अमोलक ऋषि द्वारा हिंदी में अनूदित और 
प्रकाशित जैन आगमों की बत्तीसी थी |
उस समय तक आगमों का हिंदी अनुवाद और कहीं उपलब्ध नहीं था |
इसलिए संस्कृत-प्राकृत नहीं समझने वाले साधू-साध्वियां उसका उपयोग करते थे |
कभी-कभी वे वहां आते और पढ़ने के लिए आगम-साहित्य लेना चाहते |
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हीरालालजी साधू-साध्वियों को देखते ही खड़े हो जाते
और पुरे आदरभाव के साथ पुस्तकें देते |
उन्हें देखकर मेरे मन में भी साधू-साध्वियों के प्रति श्रद्धा का भाव जागता था |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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