मेरा विद्यालय - जैनत्व के संस्कार
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मैं जहां पढ़ा, वह जैन स्कूल था |
पढानेवाले अध्यापक भी जैन थे |
इसलिए णमोक्कार मन्त्र आदि कुछ
मैं जहां पढ़ा, वह जैन स्कूल था |
पढानेवाले अध्यापक भी जैन थे |
इसलिए णमोक्कार मन्त्र आदि कुछ
तात्विक सूत्र पढ़ाई के साथ ही सिखा दिए गए |
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स्कूल की एक लाइब्रेरी भी थे |
उसमें अमोलक ऋषि द्वारा हिंदी में अनूदित और
उसमें अमोलक ऋषि द्वारा हिंदी में अनूदित और
प्रकाशित जैन आगमों की बत्तीसी थी |
उस समय तक आगमों का हिंदी अनुवाद और कहीं उपलब्ध नहीं था |
इसलिए संस्कृत-प्राकृत नहीं समझने वाले साधू-साध्वियां उसका उपयोग करते थे |
कभी-कभी वे वहां आते और पढ़ने के लिए आगम-साहित्य लेना चाहते |
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उस समय तक आगमों का हिंदी अनुवाद और कहीं उपलब्ध नहीं था |
इसलिए संस्कृत-प्राकृत नहीं समझने वाले साधू-साध्वियां उसका उपयोग करते थे |
कभी-कभी वे वहां आते और पढ़ने के लिए आगम-साहित्य लेना चाहते |
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हीरालालजी साधू-साध्वियों को देखते ही खड़े हो जाते
और पुरे आदरभाव के साथ पुस्तकें देते |
उन्हें देखकर मेरे मन में भी साधू-साध्वियों के प्रति श्रद्धा का भाव जागता था |
और पुरे आदरभाव के साथ पुस्तकें देते |
उन्हें देखकर मेरे मन में भी साधू-साध्वियों के प्रति श्रद्धा का भाव जागता था |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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