मेरे मन पर प्रभाव श्रावक-समाज का
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पांच-छह वर्ष की अवस्था में मैंने संवत्सरी का उपवास करना प्रारम्भ कर दिया |
एक बार मैंने पौषध किया |
पौषध में प्रतिक्रमण करने की अनिवार्यता होती है |
मुझे प्रतिक्रमण याद नहीं था |
प्रतिक्रमण कौन सुनाये ?
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तखतमलजी फुलफगर ने यह काम अपने पर ले लिया |
उन्होंने बहुत अच्छे ढंग से प्रतिक्रमण सुनाया |
तखतमलजी की हवेली में ही मुनि कालूजी ( बड़ा ) ने
सातवें आचार्य श्री डालगणी के मनोनयन की घोषणा की |
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उन्होंने बहुत अच्छे ढंग से प्रतिक्रमण सुनाया |
तखतमलजी की हवेली में ही मुनि कालूजी ( बड़ा ) ने
सातवें आचार्य श्री डालगणी के मनोनयन की घोषणा की |
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तखतमलजी जैन तत्व के अच्छे ज्ञाता थे |
वे जैन गणित के अच्छे विशेषज्ञ थे |
अनेक साधू उनके पास आगमों का अध्ययन करते थे |
जम्बुद्वीप आदि के नक़्शे समझाने के लिए वे उन्हें धुल में अंकित कर बताते थे |
इस उपक्रम से छोटे-छोटे साधू भी जैन भूगोल को सहजता से समझ लेते थे |
तखतमलजी शासनभक्त व्यक्ति थे |
वे जैन गणित के अच्छे विशेषज्ञ थे |
अनेक साधू उनके पास आगमों का अध्ययन करते थे |
जम्बुद्वीप आदि के नक़्शे समझाने के लिए वे उन्हें धुल में अंकित कर बताते थे |
इस उपक्रम से छोटे-छोटे साधू भी जैन भूगोल को सहजता से समझ लेते थे |
तखतमलजी शासनभक्त व्यक्ति थे |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
================================================मेरे मन पर प्रभाव श्रावक-समाज का
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तखतमलजी पगारिया लाडनूं के प्रसिद्ध श्रावक थे |
वे भी तत्वज्ञ और संघहितैषी थे |
उनकी रूचि वैराग्य के संवर्धन में थी |
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मेरे मन में वैराग्य का अंकुर फूटा तो
तखतमल जी स्वयं चलकर मेरे पास आए और बोले --
" वैरागी भाई ! तुम धन्य हो |
हम तो संसार में फंसे हुए हैं, कीचड़ से सने हुए हैं |
चाहने पर भी घर-परिवार नहीं छोड़ सकते |
तुम छोटी उम्र में साधू बनने जा रहे हो |
तुम्हें गुरु-चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिलेगा |"
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मुझे उनकी बातें अच्छी लगीं |
मैं अनुभव करता हूं कि
वैसे श्रावक अंतरंग रूप में धर्मसंघ की संभाल करते थे और
उसकी श्रीवृद्धि के लिए जागरूक रहते थे |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरे मन पर प्रभाव श्रावक-समाज का
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रतनचंदजी गोलछा धर्मसंघ के विशिष्ट श्रावक थे |
वे तत्व के जानकार थे तथा जवाब देने की कला में दक्ष थे |
उनके समय में छोगमलजी खटेड़ नाम के एक श्रावक थे |
वे सूत्र पढते थे और
ऊलजलूल तर्क करते |
एक बार उन्होंने रतनचंदजी के सामने सूत्रों का हावाला देकर कुछ उल्टी-सीधी बातें कही |
रतनचंदजी ने उन्हें समझाने का प्रयत्न किया,
पर वे नहीं समझे |
इस पर रतनचंदजी बोले --
" तुझे ज्ञान का बहुत अहंकार है |
मैं अभी तुम्हारी परीक्षा करता हूं |
उससे पता चल जाएगा तुम् कितने पानी में हो |"
उन्होंने छोगमलजी से कहा -
" दिल्ली कैसे लिखा जाता है ?"
उन्होंने उस समय प्रचलित मोडिया लिपि में दिल्ली लिखा तो 'दल' लिखा गया |
रतनचंदजी ने उनसे दूसरी बार लिखवाया तो 'दली' लिखा गया |
तीसरी बार भी शुद्ध शब्द नहीं लिखा गया |
उसके बाद रतनचंदजी ने छोगमलजी से कहा --
" मूर्ख ! दिल्ली तो लिख ही नहीं सकता और
शास्त्रों की दलीलें देता है |
अब आगे से सोच-समझकर बात करना |"
इस घटना के बाद छोगमलजी अनर्गल बात करने में संकोच करने लगे |
वे तत्व के जानकार थे तथा जवाब देने की कला में दक्ष थे |
उनके समय में छोगमलजी खटेड़ नाम के एक श्रावक थे |
वे सूत्र पढते थे और
ऊलजलूल तर्क करते |
एक बार उन्होंने रतनचंदजी के सामने सूत्रों का हावाला देकर कुछ उल्टी-सीधी बातें कही |
रतनचंदजी ने उन्हें समझाने का प्रयत्न किया,
पर वे नहीं समझे |
इस पर रतनचंदजी बोले --
" तुझे ज्ञान का बहुत अहंकार है |
मैं अभी तुम्हारी परीक्षा करता हूं |
उससे पता चल जाएगा तुम् कितने पानी में हो |"
उन्होंने छोगमलजी से कहा -
" दिल्ली कैसे लिखा जाता है ?"
उन्होंने उस समय प्रचलित मोडिया लिपि में दिल्ली लिखा तो 'दल' लिखा गया |
रतनचंदजी ने उनसे दूसरी बार लिखवाया तो 'दली' लिखा गया |
तीसरी बार भी शुद्ध शब्द नहीं लिखा गया |
उसके बाद रतनचंदजी ने छोगमलजी से कहा --
" मूर्ख ! दिल्ली तो लिख ही नहीं सकता और
शास्त्रों की दलीलें देता है |
अब आगे से सोच-समझकर बात करना |"
इस घटना के बाद छोगमलजी अनर्गल बात करने में संकोच करने लगे |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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