Friday, August 24, 2012

५. मेरे दादा

मेरे दादाजी
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मेरे दादाजी का नाम राजरूपजी था |
वे अजीमगंज के सेठ राजबहादुर बाबू बुधसिंहजी के यहां मुनीम थे |
राजरूपजी का बहुत प्रभाव था |
उनके नौकरी छोड़ने से आय सीमित हो गई |
राजरूपजी अपनी पुत्रवधू ( मेरी मां ) को लक्ष्मी मानते थे |
एक बार वे बोले -
" मेरी छोटी बहु बहुत भाग्यशालिनी है |
यह सदा फलती-फूलती रहेगी |"
घर की आर्थिक स्थिति को कमज़ोर देखकर
एक बार दादाजी बोले -
" चिंता की क्या बात है ?
परिवार में ऐसा कोई जीव पैदा होगा,
जिसकी पुण्याई से सब चमक उठेंगे |
वह सबका कल्याण कर देगा |"
धीरे-धीरे घर की आर्थिक स्थिति सुधरती गई |
दादाजी ने जिस समय दूसरी बात कही, मेरा जन्म भी नहीं हुआ था |
परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में मेरा कोई योगदान नहीं था |
किन्तु सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण हेतु अपना पूरा जीवन समर्पित कर मैंने दादाजी के कथन को सत्यापित कर दिया |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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