Friday, August 24, 2012

३३. मेरे मन पर सत्संग का प्रभाव


मेरे मन पर सत्संग का प्रभाव
मुनि हुलासमलजी ( लाडनूं ) तपस्वी संत थे |
उनका स्वभाव शांत था |
उनके चेहरे पर सौम्यता थी |
तपस्वी दुर्वासा के बारे में मैंने पढ़ा है |
कुछ तपस्वियों के आक्रोश को आंखों से देखा भी है |
पर उनके जीवन में तपस्या और शान्ति का अदभुत योग देखने को मिला |
वे बहुत वैरागी संत थे |
उनके वैराग्य और शांत भाव का मेरे मन पर गहरा प्रभाव हुआ |
वि.स.१९८३ का मर्यादा-महोत्सव लाडनूं था |
उस समय पूज्य गुरुदेव की सन्निधि में मैंने एक गीत गाया |
उसके प्रारंभिक बोल इस प्रकार थे --
" हो गणिवर ! आप बड़ा उपकारी "
कार्यक्रम संपन्न होने पर मुनि हुलासमलजी मेरे पास आकर बोले -
" तुलसी मुनि ! आज तुमने बहुत अच्छा गाया |
इतनी लंबी राग, इतनी जनता और तुमने अकेले ही गीत गा दिया |"
दीक्षित होने के थोड़े समय बाद ही गुणानुरागी तपस्वी मुनि के मुंह से अपनी प्रशंसा सुनकर मुझे अच्छा लगा |
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मेरे मन पर सत्संग का प्रभाव
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मुनि मगनलालजी !!!
गौर वर्ण, ठिगना कद, पर प्रभावशाली व्यक्तित्व |
संघ में उनका स्थान बहुत ऊंचा था |
पूज्य कालूगणी पर भी उनका प्रभाव था |
मुनि मगनलालजी का प्रभाव मैंने कई प्रसंगों पर देखा |
संघ में कोई विशेष काम होता तो
उनसे परामर्श अवश्य किया जाता |
कोई दीक्षा की प्रार्थना करता,
उसमें उनका सहयोग अनिवार्य-सा था |
जो दीक्षार्थी उनकी कसौटी पर खरा नहीं उतरता,
प्रायः उसकी भावना पूरी नहीं होती |
मेरी दीक्षा इतनी जल्दी हुई,
उसमें उनका बहुत योग रहा |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरे मन पर सत्संग का प्रभाव
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मुनि छबीलजी बगड़ी के थे |
वे बड़े संघहितैषी साधू थे |
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वे जहां भी जाते और रहते,
वैरागी तैयार करने में विशेष श्रम करते थे |
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मुनि नथमलजी ( आचार्य महाप्रज्ञ ) को
वैराग्य की दिशा में उत्प्रेरित करनेवाले वे ही थे |
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उन्हें व्याख्यान देने का बहुत शौक था |
वे जब भी गुरुकुल में आते,
प्रयत्नपूर्वक मध्यान्ह का व्याख्यान देते थे |
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उनसे पहले जो साधू व्याख्यान देने वाले होते,
उन्हें राजी कर वे अपना शौक पूरा करते |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरे मन पर सत्संग का प्रभाव
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साध्वीप्रमुखा कानकुमारीजी को
मैंने पहले एक साध्वी के रूप में
और फिर साध्वीप्रमुखा के रूप में देखा |
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वे एक स्वाध्यायशीला साध्वी थीं |
उनकी व्याख्यान कला बेजोड़ थी |
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वे बहुत बार आचार्यों के आवास-स्थल पर व्याख्यान देती थीं |
उनका व्याख्यान इतना प्रभावी होता था कि
कुछ साधू भी लक्ष्यपूर्वक उनका व्याख्यान सुनते थे |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरे मन पर सत्संग का प्रभाव
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* साध्वी मीरांजी प्रकृति से अत्यंत भद्र साध्वी थीं |
उनपर पूज्य गुरुदेव की विशेष कृपा थी |
* साध्वी भत्तुजी बहुत दाठीक साध्वी थीं |
उनके व्याख्यान साधुओं से कम आकर्षक नहीं थे |
मेरे मन पर शुरू से ही उनका प्रभाव था |
* साध्वी हीरांजी की गणना विनीत साध्वियों में होती थी |
* साध्वी गंगाजी मांडा की थी | उन्होंने गंगाशहर चोखले में संघ-विस्तार की दृष्टि से बहुत काम किया |
* साध्वी हुलासांजी सरदारशहर के गधैया परिवार की बहु थी |
उनका विनय भाव विलक्षण था |
* साध्वी खुमांजी मातुश्री छोगांजी की सेवा में रहती थीं | बात करने की कला में वे सिद्धहस्त थीं |
* साध्वी छगनांजी बोरावड़ की थीं | बहुत सरल और सजग साध्वी थीं |
वे साध्वीप्रमुखा कानकुमारीजी की सेवा में रहती थीं |
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जिन साध्वियों की यहां चर्चा की गई है, मेरे प्रति उनका बहुत वात्सल्य था |
दीक्षित होने के बाद उन्होंने कई बार मुझसे कहा --
" नान्हा म्हाराज ! गुरुदेव की सेवा बहुत बड़े सौभाग्य से मिलती है |
आप सेवा में कभी प्रमाद मत करना, सबका विनय रखना और सीखना-चितारना करते रहना |"
उन साध्वियों का रहन-सहन बहुत संयत था |
उनका सिर ढका रहता था |
सिर का एक बाल भी दिखाई नहीं देता था |
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उनकी संघनिष्ठा, गुरु भक्ति और
अपने दायित्व के प्रति जागरूकता का भाव देखने लायक था |
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कुछ साध्वियां साध्वी लाडांजी के सामने
मेरे बारे में प्रशंसात्मक बातें कहा करती थीं |
दीक्षित होने के कुछ समय बाद ही साध्वी समाज में यह चर्चा होने लगी कि
पूज्य गुरुदेव की मुझ पर अत्यधिक कृपा है |
साध्वियों में होनेवाली चर्चा की जानकारी
मुझे कभी-कभी साध्वी लाडांजी के द्वारा मिल जाती |
उस विषय की बातें सुनकर मुझे सुखद अनुभूति होती थी |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से






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