गुरु चरणों में स्वाध्याय
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रात्रि के समय मैं मुनि कुन्दनमलजी के पास सोया करता था |
गुरुदेव ने मुनि चम्पालालजी से कहा -
" चम्पालाल ! तुलछु अभी टाबर है |
आजकल सर्दी का समय है |
रात को उसके कपड़े इधर-उधर हो जाते होंगे |
तुम् उसका ध्यान रखा करो |
एक-दो बार संभाल लिया करो |"
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एक मां अपने अबोध बच्चे का जितना ध्यान रखती है,
उससे भी अधिक मेरा ध्यान रखा गया |
गुरु का वह असीम अनुग्रह मेरे निर्माण का मुख्य आधार था |
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शीतकाल की रातें लंबी होती है |
गुरुदेव चाहते थे कि हम उनका भलीभांति उपयोग करें |
इस दृष्टि से उनका निर्देश था कि
प्रातः जल्दी उठकर स्वाध्याय करना चाहिए |
पर हमारे लिए जल्दी उठाना महाभारत था |
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गुरुदेव कई बार कहते थे -
" रातें कितनी भी बड़ी हों,
बाल साधुओं की नींद उनसे भी बड़ी है |"
हमारी नींद कभी पूरी होती ही नहीं |
इसलिए जल्दी उठकर स्वाध्याय करने की बात
शुरू-शुरू में हमें अच्छी नहीं लगती थी |
फिर भी चार-साढे चार बजे उठने के लिए सायरन बजने लगता |
मुनि शिवराजजी द्वारा एक-दो बार जगाए जाने के बाद
हम छोटे साधू गुरुदेव के चरणों में जाकर बैठते और स्वाध्याय करते |
मैं स्वाध्याय करते-करते ऊंघने लगता |
तब गुरुदेव कहते -
" तुलसी ! खड़े हो जाओ |"
खड़े होने के बाद भी कभी नींद आने लगती |
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उस स्थिति में मुझे निर्देश मिलता -
" तुलसी ! बाहर बरामदे में जाओ |
आसमान में तारे हैं या नहीं ? देखकर आओ |"
देह को ठिठुराने वाली सर्दी में कमरे से बाहर
छपरे या बरामदे में जाना रुचिकर नहीं लगता |
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पर गुरुदेव के आदेश का पालन जरुरी था |
इसलिए बाहर घूमकर ऊंघ उड़ाकर पुनः आता |
आज उन बातों को स्मरण करता हूं तो मन में आता है कि
पूज्य गुरुदेव ने मेरा निर्माण करने के लिए कितना श्रम किया |
उस समय आप इतना ध्यान नहीं देते
तो पता नहीं मैं आज कहां होता ?
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दीक्षा के दो वर्षों बाद मेरा सोना और बैठना प्रायः गुरुदेव के पास होने लगा |
तब तक चार बजे उठने का क्रम व्यवस्थित हो गया |
कभी-कभी आप कहते -
" तुलसी ! तू रात में बड़ी अच्छी नींद लेता है |
आज तो तुमने पूरी रात करवट ही नहीं बदली |
जितनी बार तुझे देखा, तू एक ही पार्श्व में सोया था |"
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वे बचपन के दिन !
पूज्य गुरुदेव का वह साया !
जीवन में पूरी निश्चिन्तता थी |
आनंद ही आनंद था |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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