Friday, August 24, 2012

३५. मेरा नया जन्म

मेरा नया जन्म
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लाडनूं से सुजानगढ़ के रास्ते में उत्तरी दरवाजे से आधा किलोमीटर पर
मालमचंदजी बोरड की कोठी थी |
वहां काली देवी का मंदिर था |
इसलिए वह स्थान कालीजी की बगीची नाम से प्रसिद्ध था |
बगीची के बाहर खुला चौक था |
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पूज्य गुरुदेव कालूगणी पौष कृष्णा चतुर्थी को
संध्या के समय गांव से विहार कर बगीची में पधार गए |
पंचमी के दिन प्रातःकाल ही मेरी दीक्षा होने वाली थी |
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उस दिन मुझे सूर्योदय से बहुत पहले उठा दिया गया |
सर्दी का समय था |
ठंडी हवाएं चल रही थी |
शरीर से कपड़े उतारने की इच्छा नहीं थी |
किन्तु पारिवारिक जनों के निर्देशानुसार स्नान किया |
नाई से बाल कटवाए |
नए वस्त्र पहने |
कई प्रकार के 'नेगचार' किया गए |
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इन सब क्रियाओं के समय महिलाएं मीठे स्वरों में गीत गाती रहीं |
गीत गाते-गाते ही उन्होंने सूर्योदय से पहले ही
मुझे गुरुदेव के उपपात में पहुंचा दिया |
बहन लाड भी मेरे साथ वहां पहुंच गई |
हम दोनों वैरागी की वेशभूषा पहने हुए थे |
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सारी प्रक्रिया संपन्न होने पर पूज्य गुरुदेव ने आगमवाणी का उच्चारण किया --
' करेमि भंते ! सामाइयं सव्वं सावज्ज जोगं पच्चक्खामि ....|'
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गृहस्थ जीवन छूटा और मुनि जीवन का प्रारम्भ हो गया |
उसके तत्काल बाद मुनि जीवन का प्रतीक
रजोहरण मेरे हाथ में थमा दिया गया |
एक दृष्टि से मेरा नया जन्म हो गया |
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पिछले जीवन की आलोचना के लिए गुरुदेव ने हमको
'चउव्वीसत्थव' करवाया और साधू जीवन के लिए उपयोगी शिक्षावचन कहे |
विधिवत वंदना कर मैंने गुरुदेव का चरणस्पर्श किया |
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उस समय मैं रोमांचित हो गया,
जब गुरुदेव के वरद हाथ मेरे सिर पर आए |
उन्होंने आहिस्ते से मेरे सिर पर रहे कुछ केशों का लुंचन किया |
मैंने अपना सिर उनके चरणों में टिका दिया |
उन्होंने आत्मीय भाव से सिर सहलाकर मुझे अपना शिष्य बना लिया |
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उधर साध्वीप्रमुखा कानकुमारीजी ने साध्वी लाड का
केश-लुंचन कर उन्हें अपने निकट बिठा लिया |
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गुरुदेव के निर्देश से श्रावक-श्राविकाओं ने हमारे सम्मान में
' मत्थएण वन्दामि ' शब्दोच्चारणपूर्वक नमन किया
तो एक बार कुछ संकोच का अनुभव हुआ |
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मैंने पूज्य गुरुदेव को निकटता से देखा,
मेरे मन में दीक्षा का संकल्प उठा और
पूज्य गुरुदेव के करकमलों से मेरा दीक्षा संस्कार संपन्न हुआ |
दर्शन, संकल्प और संस्कार के बीच केवल ३० दिन का समय |
चिंतन, निर्णय और क्रियान्विति में विशेष अंतराल नहीं रहा |
इसी प्रकार दीक्षा संस्कार और विहार के बीच में भी कोई अंतर नहीं रहा |
दीक्षा के तत्काल बाद पूज्य गुरुदेव ने लाडनूं से सुजानगढ़ के लिए विहार कर दिया |
मुझे आगे-आगे चलने का निर्देश मिला |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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मेरा नया जन्म 
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पहला पाठ -
उस समय मेरी अवस्था ग्यारह वर्ष की थी |
लाडनूं से सुजानगढ़ का सीधा रास्ता दस किलोमीटर का है |
बचपन का जोश और दीक्षा का उत्साह |
मैं बहुत तेज गति से चलने लगा |
मुनि चम्पालालजी पूज्य गुरुदेव के साथ चल रहे थे |
उन्होंने मुझे सजग करते हुए कहा -
" तुलसी ! इर्यासमिति-इर्यासमिति |"
उनके कथन का अभिप्राय था कि मैं कुछ धीमे चलूँ
और देख-देख कर चलूँ | एक बार मैं रुका |
थोड़ी देर धीमे-धीमे चला |
गति में फिर शीघ्रता आ गई |
मुनि चम्पालालजी कुछ आगे बढ़कर मेरे निकट आए |
मुझे सचेत करने के लिए उन्होंने फिर कहा -
" इर्यासमिति !"
उनकी आवाज़ सुनकर मैं रुक गया |
मुझे समझाते हुए वे बोले --
" तुलसी ! तुम साधू बन गए हो |
अब चलना मुख्य बात नहीं है | मुख्य बात है देखकर चलना |
इतनी शीघ्र गति से चलते समय इर्यासमिति में जागरूकता कैसे रहेगी ?
मुनि चम्पालालजी का यह कथन मेरे मन को छु गया |
मैंने मन ही मन सोच लिया कि बिना देखे एक कदम भी नहीं चलना है |
दीक्षा के प्रथम दिन मिले वे संस्कार इतने बद्धमूल हो गए कि
चलते समय इधर-उधर देखने की वृत्ति ही बदल गई |
इस घटना की जब स्मृति होती है,
उस समय सोचता हूं कि
बचपन में जो पाठ अच्छे ढंग से पढ़ाया जाता है,
उसका प्रभाव जीवन भर रह सकता है |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरा नया जन्म
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" प्रथम ग्रास - ओज आहार " -
गुरुदेव का प्रवास हजारीमलजी रामपुरिया के कमरे में हुआ |
वहां गुरुदेव के कर-कमलों से
पहला ग्रास लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ |
मैं उस समय गुरुदेव के सामने खड़ा था |
उनके निर्देशानुसार मुखवस्त्रिका खोलकर एक ओर रख दी |
बाएं हाथ पर दायां हाथ रखा |
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गुरुदेव ने असीम वात्सल्य के साथ
दही और मिश्री का ग्रास दिया |
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उसमें कितना रस और माधुर्य था,
शब्दों में अभिव्यक्ति नहीं दी जा सकती |
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उस ग्रास को ओज आहार के रूप में जाना जाता है |
नए जीवन के प्रारम्भ में प्रत्येक जीव को
सर्वप्रथम जो आहार प्राप्त होता है,
उसे ओज आहार कहा जाता है |
वह समग्र जीवन यात्रा का आधार बनता है |
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उसी प्रकार गुरुदेव द्वारा प्राप्त वह प्रथम ग्रास
मेरे लिए अत्यधिक संपोषक और शक्तिवर्धक था |
उससे रास्ते की सारी थकान उतर गई |
प्रवचन के कुछ देर बाद गोचरी आ गई |
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आहार करने के लिए मुझे पूज्य गुरुदेव
के उपपात में बिठाया गया |
मैं नया था |
आहार क्या करना ? और कैसे करना ?
मुझे कोई अनुभव नहीं था |
साधुओं ने मुझे सारी विधि समझाई |
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एक बार समझाने के बाद मैं प्रायः हर काम ठीक से कर लेता था |
प्रतिलेखन, प्रतिक्रमण, पंचमी समिति आदि
दैनिक कार्यों के बारे में भी साधुओं द्वारा
निर्दिष्ट तरीके मैंने बहुत जल्दी सीख लिए |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरा नया जन्म
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नए जीवन का प्रथम सप्ताह -
साधू जीवन का प्रथम सप्ताह बहुत आनंद से बीता |
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नए जीवन के प्रति जिज्ञासा और
कुतूहल की बात अस्वाभाविक नहीं था |
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फिर भी एक-एक कर अनेक बातें समझ में आ गई |
गृहस्थ अवस्था में साधू जीवन को लेकर
जो विभीषिका दिखाई गई थी,
वह समाप्त हो गई |
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गुरुदेव की कृपा और शिक्षा मेरे लिए सबसे बड़ी शक्ति थी |
बड़े साधुओं के स्नेह और सेवाभाव से मैं अभिभूत था |
सब कुछ अच्छा लग रहा था |
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गुरुदेव के निर्देशानुसार सीखने-चितारने का क्रम चलने लगा |
प्रतिक्रमण पहले से सीखा हुआ था |
उसे जल्दी पक्का कर लिया |
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उसके बाद गुरुदेव ने दशवैकालिक सूत्र प्रारम्भ करा दिया |
पाठ कंठस्थ करने में मन लगता था |
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संध्याकालीन प्रतिक्रमण के बाद मैं नियमित रूप से
गुरुदेव की उपासना में बैठता |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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मेरा नया जन्म
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मेरी दैनिक चर्या की देखरेख का दायित्व मुनि चम्पालालजी पर था |
वैसे मेरे प्रत्येक क्रियाकलाप पर गुरुदेव स्वयं भी नज़र रखते थे |
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साध्वीप्रमुखा कानकुमारीजी और
साध्वी झमकूजी भी मेरा बहुत ध्यान रखती थीं |
वे समय-समय पर मुझे शिक्षा देती रहती थीं |
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दीक्षा के आठवें दिन पूज्य गुरुदेव ने
हम दोनों भाई-बहनों को बड़ी दीक्षा दी |
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बड़ी दीक्षा का अर्थ है छेदोपस्थानीय चारित्र |
दीक्षा ग्रहण करते समय सामायिक चारित्र की उपलब्धि होती है |
समुच्चय रूप में सावद्द योग का प्रत्याख्यान कराया जाता है |
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सात दिनों में साधूचर्या की प्राथमिक जानकारी हो जाती है |
उसके बाद बड़ी दीक्षा के समय
प्रत्येक महाव्रत को विस्तार से समझाकर
अलग-अलग त्याग कराया जाता है |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरा नया जन्म
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सुजानगढ़ के कुछ श्रावक -
आहार का काम दानचंदजी चोपड़ा की हवेली में होता था |
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धर्मोपासना में उनकी इतनी लगन थी कि
घर में शादी विवाह का प्रसंग होने पर भी
नियमित रूप से चार-पांच सामायिक कर लेते |
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दानचंदजी चोपड़ा के साथियों की एक मंडली थी |
उसमें धनराजजी बैद, प्रेमचंदजी सिंघी, झूमरमलजी डोसी,
झूमरमलजी चोरड़िया, हजारीमल जी बैद,
शिवजीरामजी बैंगानी ( बीदासर ), प्रतापमलजी बोथरा ( राजलदेसर )
आदि सम्मिलित थे |
ये सभी शासन के परमभक्त थे |
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पूज्य कालूगणी यात्रा करते,
तब ये सब मिलकर रास्ते की सेवा करते थे |
इनका मैत्रीभाव और भक्तिभाव उल्लेखनीय रहा |
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प्रतापमल जी बोथरा अच्छे गायक थे |
एक बार पूज्य कालूगणी थली से मारवाड़ पधार रहे थे |
उस समय प्रतापमलजी ने एक विदाई गीत गाया |
पूरा गीत आकर्षक था |
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उसका एक पद्द मुझे अब भी याद है --
" मारवाड़ को मीठो पाणी, लाल गवां री रोटी |
मिसी-बाजरी नै भूल न जाज्यो महर रखाज्यो मोटी ||"

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरा नया जन्म
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सुजानगढ़ के हजारीमलजी रामपुरिया का
एकमात्र दोहित्र और अपने पिता का एकमात्र पुत्र
शुभकरण दसानी उस समय अपने नाना के पास सुजानगढ़ रहता था |
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सुजानगढ़ के प्रथम प्रवास में मेरा किसी गृहस्थ से खास परिचय नहीं था |
शुभकरण के मन में मेरे प्रति कोई अज्ञात आकर्षण था |
वह मेरे पास बैठने और बोलने के लिए उत्सुक रहता था |
किन्तु मैं अपने सीखने में संलग्न था |
इसलिए उसके साथ विशेष बात करने का प्रसंग नहीं आता था |
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फिर भी उसे देखकर लगा कि
वह बुद्धिमान, सूझबूझवाला और कर्तृत्वशील व्यक्ति है |
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श्री डूंगरगढ़-प्रवास में पूज्य गुरुदेव ने हमको आचार्य सोमप्रभ द्वारा रचित
" सिन्दूरप्रकर " नाम का काव्य सिखाना शुरू किया |
वे हमें प्रतिदिन एक-एक श्लोक पढ़ाते |
हम उसे याद करते और संध्याकालीन प्रतिक्रमण
के बाद सामूहिक रूप से सुनाते |
गुरुदेव उस छंद की राग भी हमें धराते |
सिन्दूरप्रकर काव्य सीखना हमें बहुत रुचिकर लगा |
उसमें हम पूरा रस लेते थे |
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सिन्दूरप्रकर के बाद गुरुदेव ने हमें भक्तामर स्तोत्र सिखाया |
मुनि पृथ्वीराजजी तपस्वी, वैरागी और कष्टसहिष्णु संत थे |
शास्त्रों का स्वाध्याय अच्छा करते थे |
उनकी सेवा में देवता आते थे,
यह बात प्रसिद्ध थी |
वे रात्रि के समय नींद बहुत कम लेते थे |
बैठे-बैठे स्वाध्याय करते रहते |
उस समय यदा-कदा वैसी घटना घटित हो जाती |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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