एक बार मैं अपने दो-तीन साथियों के साथ गुरुदेव कालूगणी के दर्शन करने सुजानगढ़ गया |
उस दिन गुरुदेव पंचमी समिति के लिए लाडनूं के रास्ते की ओर पधार रहे थे |
हमने वहीँ पर उनके दर्शन किये |
उन्होंने पूछा -
" तुम लोग कौन हो ?
कहां से आये हो ?"
मैंने कहा -
" हम लाडनूं से आपके दर्शन करने आये हैं |"
गुरुदेव से मेरा कोई परिचय नहीं था |
उनके साथ मुनि चम्पालालजी भी थे |
वे बोले -
" यह मेरा संसारपक्षीय छोटा भाई है |
इसका नाम तुलसी है |"
गुरुदेव ने अपनत्व भरे लहजे में हमारी वंदना स्वीकार की |
उनका यों रास्ते में खड़े रहना और हमें पूछताछ करना बहुत सुखद लगा |
वे क्षण मेरे जीवन के बहुत आह्लादकारी क्षण थे |
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