Friday, August 24, 2012

३. मेरा घर

 मेरा घर
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मनुष्य के छोटे-छोटे सपनों में एक सपना होता है -
उसका अपना घर |
अपना घर केवल सुविधा और स्थिरता ही नहीं देता,
व्यक्ति का गौरव भी बढाता है |
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गृहस्थ जीवन में हमारा भी अपना घर था |
लाडनूं कस्बे की दूसरी पट्टी की नुक्कड़ पर बना 
वह घर आज भी मुझे याद है |
घर का द्वार पश्चिम की ओर खुलता है |
पांच-सात सीढियां चढ़ने पर उनके दोनों ओर दो बैठकखाने हैं |
बैठकखाने को हम ' दुलेची ' कहते थे |
बैठकखाने से आगे घर का मुख्यद्वार है |
उसे पार करते ही लंबी द्वारशाला है,
जिसे हम ' बरसाली ' कहा करते थे |
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बरसाली के दोनों ओर सीढियां उतरकर दो नोहरे हैं |
नोहरों में पानी के कुण्ड थे,
जो वर्षा के पानी से भर जाते और
प्रायः सालभर उनका पानी काम में आता |
घर के आँगन में दो रसोइयां और दो जलघर थे |
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आँगन के बाद दो-दो ओरे थे |
उनमें से एक ओरे में मेरा जन्म हुआ |
आँगन में दोनों ओर ऊपर जाने के लिए सीढियां हैं |
ऊपर बहुत बड़ी खुली छत है |
छत पर दो छोटे-छोटे मालिये - कमरे बने हुए हैं |
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गर्मी के दिनों में हम छत पर सोया करते थे |
सर्दी के समय ठंडक से ठिठुरते तो ऊपर चले जाते और 
सूरज की तरफ मुंह करके बोलते -
" सुरजी बाबा ! तावड़ो ही काढ रे |
थारा छोरा-छोरी सींयां मरै रे ||"
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थोड़ी देर में धुप निकल आती |
हम नाचते-कूदते और ठिठुरन दूर हो जाती |
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पूर्व में सुजानगढ़ दिखाई देता |
उत्तर में गोपालपुरा की पहाडियां हमारी आंखों को आकृष्ट करती |
दक्षिण दिशा में ' ऊपरला वास ' दिखाई देता |
बहुत बार हम जैन मंदिर के स्वर्ण कलश गिना करते |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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