मेरा बचपन - एलर्जी
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हर व्यक्ति की कोई होबी होती है,
तो किसी-किसी को कुछ बातों से एलर्जी भी होती है |
मुझे बचपन से ही ३ बातों से चिढ़ थी |
१. सिर में घी लगाने से
२. खुले या बिखरे हुए बालों से
३. रोने से
मां कई बार अपने सिर में घी लगाती थी |
मेरा मन उससे बेचैन हो जाता |
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हर व्यक्ति की कोई होबी होती है,
तो किसी-किसी को कुछ बातों से एलर्जी भी होती है |
मुझे बचपन से ही ३ बातों से चिढ़ थी |
१. सिर में घी लगाने से
२. खुले या बिखरे हुए बालों से
३. रोने से
मां कई बार अपने सिर में घी लगाती थी |
मेरा मन उससे बेचैन हो जाता |
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लाडांजी आदि बहनें सिर धोने के बाद बाल सुखाने के लिए
कुछ समय तक उन्हें खुला रखती थीं |
वह मुझे पसंद नहीं था |
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वह मुझे पसंद नहीं था |
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दीक्षित होने के बाद का प्रसंग है |
बीदासर में दो लड़के आये, उनके बाल बढे हुए थे |
उन्होंने वंदना की तो उनके बाल मेरे पैरों में छितर गए |
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बीदासर में दो लड़के आये, उनके बाल बढे हुए थे |
उन्होंने वंदना की तो उनके बाल मेरे पैरों में छितर गए |
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मातुश्री वदनांजी सामने बैठी थी |
वे खुलकर हँसने लगी |
मैंने हंसी का कारण पूछा तो वे बोली -
" अबै ऐ माळ आपनै किन्यां सुहाया ?
बीं बगत एक भी बाल आ ज्यातो तो उल्टी कर घर भर देता |"
मैंने कहा -
" माजी ! उस समय हम इतने सयाने नहीं थे |
सयाने होते तो आपको तंग नहीं करते |"
वे खुलकर हँसने लगी |
मैंने हंसी का कारण पूछा तो वे बोली -
" अबै ऐ माळ आपनै किन्यां सुहाया ?
बीं बगत एक भी बाल आ ज्यातो तो उल्टी कर घर भर देता |"
मैंने कहा -
" माजी ! उस समय हम इतने सयाने नहीं थे |
सयाने होते तो आपको तंग नहीं करते |"
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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