Friday, August 24, 2012

३६. मेरे संरक्षक मुनि

मेरे संरक्षक मुनि
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पूज्य गुरुदेव ने मुझे सिखाने-पढाने और
संस्कार देने का दायित्व
मुनि कुन्दनमलजी (जावद) को दिया |
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मुनि कुन्दनमलजी अपने समय के अच्छे साधुओं में एक थे |
उनके व्यवहार में वैराग्य छलकता था |
उनकी वृत्तियों में अंतर्मुखता थी |
वे बहुत विनीत थे |
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गुरुदेव के इंगित की आराधना करने में सजग थे |
छोटे साधुओं को संस्कार देने की कला में निष्णात थे |
दीक्षा के बाद बालक हो या वयस्क हो,
उसे साधू की चर्या बालक की ही तरह सीखनी होती है |
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बचपन में जो संस्कार मिलते हैं,
वे भावी जीवन का आधार बनते हैं |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरे संरक्षक मुनि
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मुनि कुन्दनमलजी ने साधुत्व के संस्कारों को
पुष्ट करने के लिए मुझे काफी विस्तार से बताया |
अनुकूल-प्रतिकूल परस्थिति में समता का
अभ्यास करने की प्रेरणा भी दी गई |
कुछ मर्यादाएं बताई |
व्यवस्थाओं के बारे में जानकारी दी और यह भी कहा कि
संघ और संघपति के प्रति समर्पण होना चाहिए |
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इस विषय में रत्नाधिक साधुओं का आचार और
व्यवहार भी मेरे लिए मार्गदर्शक का काम करता रहा |
गुरुदेव का वात्सल्य मेरे लिए सहज वरदान था |
उनके प्रति मेरा व्यवहार कैसा होना चाहिए ?
इस सन्दर्भ में मुनि कुन्दनमलजी ने समय-समय पर अनेक सूत्र दिए |
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उन सब सूत्रों को संकलित रूप से यहां प्रस्तुत किया जा रहा है --
* गुरु कभी कुछ कहें तो हाथ जोड़कर निकट पहुंचकर सुनना चाहिए |
* गुरु के वचनों को बहुमान देना चाहिए |
* गुरु के इंगित को समझने तथा दृष्टि की आराधना करने का लक्ष्य रहना चाहिए |
* कभी रास्ते में गुरु मिल जाएं तो पंचांगप्रणति-पूर्वक वन्दना करनी चाहिए |
* गुरु के आदेश-निर्देश को हार्दिक भाव से स्वीकार कर
उसकी क्रियान्विति के लिए सजग रहना चाहिए |
* गुरु जब कभी प्रवास-स्थल से बाहर जाएं,
उनके साथ जाने का लक्ष्य रखना चाहिए |
कदाचित साथ ना जा सके तो उन्हें कुछ देर पहुंचाने जाना चाहिए |
* स्थान में लौटते समय गुरु के साथ हो तो ठीक,
अन्यथा सामने जाने की प्रवृत्ति होनी चाहिए |
किसी कारणवश सामने न जा सके तो
स्थान में पहुँचते ही वन्दना करनी चाहिए |
* कोई भी ऐसा काम नहीं किया जाए,
जिससे गुरु अप्रसन्न हों |
* गुरु का आशीर्वाद सफलता का आधार है,
यह मानकर उनका आशीर्वाद पाने के लिए सचेष्ट रहना चाहिए |
* गुरु के साथ बात करने का प्रसंग हो तो
बद्धांजलि सिर झुकाकर की जाए |
* कभी गुरु अप्रसन्न हो जाएं अथवा उनकी दृष्टि में अंतर आ जाए
तो उन्हें प्रसन्न कर पुनः कृपा दृष्टि पाने का प्रयास करना चाहिए |
* गुरु की जैसी दृष्टि हो, उसी रूप में काम करना चाहिए |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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मेरे संरक्षक मुनि
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मुनि कुन्दनमलजी का चिंतन था कि
एक-दो वर्ष छोटे साधुओं को अच्छे ढंग से संभाल लिया जाए
तो उनका व्यवस्थित होता रहता है |
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साधुओं के पारस्परिक व्यवहार के सन्दर्भ में उन्होंने मुझे कहा --
* बड़े साधू रास्ते में मिले तो हाथ जोड़कर
'मत्थएण वंदामि' बोलना चाहिए |
* बड़े संत कुछ पूछे तो विनयपूर्वक उत्तर देना देना चाहिए |
* कोई साधू गलती बताए तो
'तहत' कहकर स्वीकार करना चाहिए |
* प्रतिदिन प्रतिक्रमण के बाद बड़े साधुओं को
वन्दना करना हमारी विनय की परम्परा है |
* छोटे साधुओं के प्रति भी हमारा व्यवहार
शालीनतापूर्वक होना चाहिए |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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मेरे संरक्षक मुनि
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मुनि कुन्दनमलजी एक जागरूक प्रहरी की तरह अपने दायित्व के प्रति सजग थे |
उनकी देखरेख में मेरा जीवन बना |
मुनि चौथमलजी भी मुझे बहुत वात्सल्य देते थे |
उन दिनों बोझ-भार की व्यवस्था का दायित्व उनपर था |
वे मुझे बोझ की पांती नहीं देते थे |
मैंने गुरुदेव से निवेदन किया तो 
आपने मुनि चौथमलजी से कहा -
" तुलछु को पूठा दे दिया करो |"
उसके बाद मुझे बोझ में गुरुदेव का पूठा मिलने लगा |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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