मेरी दीक्षा के प्रयत्न
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मन में विविध प्रकार की कल्पनाएं और आशाएं संजोते हुए
मन में विविध प्रकार की कल्पनाएं और आशाएं संजोते हुए
मोहनलालजी ट्रेन से सुजानगढ़ की स्टेशन पर उतरे |
उस समय तक उनके सामने एकमात्र बहन की दीक्षा का काल्पनिक चित्र था |
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उस समय तक उनके सामने एकमात्र बहन की दीक्षा का काल्पनिक चित्र था |
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स्टेशन पर कुछ परिचित लोग मिल गए |
उन्होंने कहा -
" तुलसी की दीक्षा के बारे में भी बात चल रही है |"
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उन्होंने कहा -
" तुलसी की दीक्षा के बारे में भी बात चल रही है |"
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इस जानकारी से वे प्रसन्न नहीं हुए |
उनका मन खिन्न हो गया |
एक बार उन्होंने सोचा कि पुनः सिराजगंज लौटना ठीक रहेगा,
अन्यथा दबाब पड़ेगा |
फिर सोचा - इतनी दूर आ गया |
अब कालूगणी के दर्शन किये बिना जाना ठीक नहीं होगा |
यहां आकर मां से मिले बिना लौट जाऊँगा तो उन्हें कितना दुःख होगा |
मेरे लाडनूं न जाने से बहन की दीक्षा में पुनः व्यवधान उपस्थित हो गया तो ?
इस प्रकार की उधेड़बुन ने उनको लाडनूं आने के लिए विवश कर दिया |
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लाडनूं पहुंचकर मोहनलालजी सीधे घर आकर मां से मिले |
वे अपनी मां के बड़े विनीत थे |
उन्होंने मां के चरण छुए,
पर वे कुछ अनमने थे |
उनकी आकृति देखकर मां घबरा गई |
वह कुछ कहे, उससे पहले ही वे कुछ उग्र होकर बोले -
" मांजी ! यह क्या ढंग है ?
क्या घर के सब लोगों को मोडा ( साधू ) बनाना है |
भाई चम्पालालजी साधू बन गए |
बहन लाड की तैयारी है |
अब तुलसी को भी तैयार कर रही हो |
क्या आपने घर में बैठकर यही काम किया है |"
मां उनकी बात सुनकर सहम गई |
वह धीरे से बोली -
" भाई मूणू ! मैं कुछ नहीं जानती |
तुलसी को मैंने तैयार नहीं किया |
अब तुम् आ गए हो |
तुम्हे ठीक लगे, वैसा करना |
तुम्हारी इच्छा हो तो आज्ञा देना |
तुम् न् चाहो तो मना कर देना |
तुम्हारी आज्ञा के बिना कोई काम नहीं होगा |"
एक मां का अपने पुत्र के प्रति इतना समर्पण !
मोहनलालजी क्या बोलते !
वैसे भी मां के प्रति बहुत विनम्र थे |
बात वहीँ समाप्त हो गई |
उनका मन खिन्न हो गया |
एक बार उन्होंने सोचा कि पुनः सिराजगंज लौटना ठीक रहेगा,
अन्यथा दबाब पड़ेगा |
फिर सोचा - इतनी दूर आ गया |
अब कालूगणी के दर्शन किये बिना जाना ठीक नहीं होगा |
यहां आकर मां से मिले बिना लौट जाऊँगा तो उन्हें कितना दुःख होगा |
मेरे लाडनूं न जाने से बहन की दीक्षा में पुनः व्यवधान उपस्थित हो गया तो ?
इस प्रकार की उधेड़बुन ने उनको लाडनूं आने के लिए विवश कर दिया |
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लाडनूं पहुंचकर मोहनलालजी सीधे घर आकर मां से मिले |
वे अपनी मां के बड़े विनीत थे |
उन्होंने मां के चरण छुए,
पर वे कुछ अनमने थे |
उनकी आकृति देखकर मां घबरा गई |
वह कुछ कहे, उससे पहले ही वे कुछ उग्र होकर बोले -
" मांजी ! यह क्या ढंग है ?
क्या घर के सब लोगों को मोडा ( साधू ) बनाना है |
भाई चम्पालालजी साधू बन गए |
बहन लाड की तैयारी है |
अब तुलसी को भी तैयार कर रही हो |
क्या आपने घर में बैठकर यही काम किया है |"
मां उनकी बात सुनकर सहम गई |
वह धीरे से बोली -
" भाई मूणू ! मैं कुछ नहीं जानती |
तुलसी को मैंने तैयार नहीं किया |
अब तुम् आ गए हो |
तुम्हे ठीक लगे, वैसा करना |
तुम्हारी इच्छा हो तो आज्ञा देना |
तुम् न् चाहो तो मना कर देना |
तुम्हारी आज्ञा के बिना कोई काम नहीं होगा |"
एक मां का अपने पुत्र के प्रति इतना समर्पण !
मोहनलालजी क्या बोलते !
वैसे भी मां के प्रति बहुत विनम्र थे |
बात वहीँ समाप्त हो गई |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरी दीक्षा के प्रयत्न - २
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मोहनलालजी उनकी बात भी टाल गए |
उन्होंने बार-बार जोर लगाया तो वे बोले -
चम्पालालजी स्वामी ! आप जो बात पकड़ लेते हैं,
उसे छोड़ते नहीं |
तुलसी अभी तक बच्चा है |
वह क्या समझता है ?
आपने उसको चढ़ा दिया |
आप घर छोड़कर चले गए तो क्या सबका घर छुड़वाना है ?
आप कुछ सोच-समझकर बात करें |
दीक्षा क्या कोई तमाशा है ?
आपने जो रास्ता लिया है, वह आपके लिए ठीक हो सकता है |
तुलसी उस पर चल पायेगा, इसकी क्या गारंटी है ?
अब आप उसके सामने इस विषय की कोई चर्चा ही न करें |
मुनि चम्पालालजी मोहनलालजी की बेरुखी से न सहमे और न निराश हुए |
वे शान्ति से बोले -
" मैं भी तो बड़ा भाई हूं | मेरा भी कुछ दायित्व है |"
इतना कहकर वे मौन हो गए |
मोहनलालजी चुपचाप वहां से उठकर चले गए |
कुछ और संतों ने भी मोहनलालजी को समझाने का प्रयत्न किया,
पर किसी को सफलता नहीं मिली |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरी दीक्षा के प्रयत्न - ३
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मुनि मगनलालजी ने मोहनलालजी को याद किया और
उनके साथ दीक्षा के सम्बन्ध में बात की |
मोहनलालजी पर उनका गहरा असर हुआ |
वे चुपचाप बैठ गए |
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मुनि मगनलालजी बोले -
" तुलसी दीक्षा की बात कर रहा है,
पर तुम्हारी आज्ञा के बिना दीक्षा का सवाल ही नहीं है |
बोलो, तुम् क्या सोचते हो ? "
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मुनि मगनलालजी का बात करने का तरीका ही कुछ ऐसा था कि
मोहनलालजी का कठोर रुख बदल गया |
उन्होंने विनम्रता के साथ कहा -
" आप माइत हैं | आपने तुलसी को परखा है क्या ?
अभी वह ग्यारह वर्ष का बच्चा है |
अपने हित अहित के बारे में उसका कोई चिंतन नहीं हो सकता |
दीक्षा जीवन भर का काम है |
आज वह भावुकता में दीक्षा की बात करे,
काल साधुत्व के कष्टों को न सह सके तो जगहंसाई होगी |
अभी दीक्षा हो जाए, यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही है |"
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उनके मानसिक द्वंद्व को समझकर मुनि मगनलालजी ने कहा -
" मोहनजी ! तुम्हारा चिंतन असंगत नहीं है |
अभिभावकों का दायित्व है कि वे बच्चे की पूरी परीक्षा करें |
पर तुम्हें मुझ पर भरोसा है या नहीं ?
मैंने जो बात रखी है, बिना सोचे-समझे नहीं रखी है |
मैं उसे नहीं परखता और अपनी कसौटी पर खरा नहीं पाता
तो बात को आगे बढाता ही नहीं |
कोई भी दीक्षार्थी जब तक मेरी नज़रों से उत्तीर्ण नहीं होता है,
मैं उसकी वकालत नहीं करता |
तुम यह भी सोचो कि तुम्हारे घर से बड़ा घर यह धर्मशासन है |
अभी तक तुलसी टाबर है |
यह बात सही है |
पर हम यदि बच्चों को लेते हैं तो चिंतन करके ही लेते हैं |"
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मुनि मगनलालजी से सीधी बात करने के बाद
मोहनलालजी का मन कुछ आश्वस्त हुआ |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरी दीक्षा के प्रयत्न - ४
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मुनि मगनलालजी ने मोहनलालजी को गुरुदेव के दर्शन कराए |
वे गुरुदेव को देवपुरुष मानते थे |
मुनि मगनलालजी ने उनका परिचय देते हुए कहा -
" अन्दाताधिराज ! ये मुनि चम्पालाल के संसारपक्षीय भाई हैं |
धार्मिक वृत्ति के व्यक्ति हैं |
पुरे परिवार का दायित्व इन्हीं पर है |
तुलसी की दीक्षा के बारे में मैंने इनसे बात की है |"
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गुरुदेव उनकी ओर देखकर बोले -
" व्यक्ति तो समझदार लगते हैं |
दीक्षा के बारे में इनका क्या चिंतन है ? "
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मुनि मगनलालजी मोहनलालजी के मुखातिब होकर बोले -
" तुलसी की भावना दीक्षा लेने की है |
तुम् इस विषय में क्या सोचते हो ? "
मोहनलालजी ने निवेदन किया -
" तुलसी हमारे घर की कीमती चीज है |
उसे आप तोल लें | हम तो आपके टाबर हैं |
हम आपकी दृष्टि से बाहर नहीं जा सकते |
आप अनुभवी हैं | आपको विश्वास हो, वैसा करें |"
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ये शब्द कहते-कहते मोहनलाल जी आंखें नम हो गई |
उस समय गुरुदेव का वरद हाथ उनकी पीठ पर टिका |
वे रोमांचित हो गए |
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गुरुदेव बोले -
" मोहनजी ! हमने तुलसी को देखा है, परखा है, तोला है |
उसके बारे में तुम् निश्चिंत रहो |
तुम्हें कोई आपत्ति हो तो हमें बताओ |"
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गुरुदेव के शब्दों ने जादू का-सा काम किया |
मोहनलालजी उनके चरणों प्रणत हो गए |
वे भावविह्वल होकर बोले -
" गुरुदेव ! आप महान हैं,
मेरा चिंतन बहुत छोटा है |
मेरी दृष्टि में तुलसी अभी बालक है |
वह कुछ बड़ा हो जाए और साधू जीवन को अच्छी तरह समझ ले |
तत्पश्चात उसके विचार पक्के होंगे तो मैं बाधक नहीं बनूंगा |"
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गुरुदेव ने मोहनलालजी को पूर्ण रूप से आश्वस्त करते हुए कहा -
" वह हमारी नज़रों के सामने है |
उसके विचारों में कोई शिथिलता नहीं है |
उसका समय यों ही व्यर्थ जाएगा |"
मोहनलालजी का मन दुविधा में था |
वे न हां कहने की स्थिति में थे और
न उनमें मना करने का साहस था |
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वे बोले - गुरुदेव ! आप सर्वज्ञतुल्य हैं |
आपकी शुभ दृष्टि हमारे परिवार का सौभाग्य है |
इस विषय में आपका निर्णय मुझे शिरोधार्य है |"
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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