Friday, August 24, 2012

२९. मेरी बहन का वैराग्य


मेरी बहन का वैराग्य
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मेरी बहन लाड तीनों बहनों में सबसे बड़ी थी |
उस समय कन्याओं को पढाने की परम्परा नहीं थी |
ज्येष्ठ महीने में बहन का विवाह हीरालालजी बैद के साथ हुआ
और
कार्तिक महीने में मेरा जन्म हुआ |
ससुराल में उसने सास-ससुर का दिल जीत लिया |
ननद केसर बाई के साथ भी उसकी अच्छी पटती थी |
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विवाह के ३-४ साल बाद हीरालालजी का विरक्त हो गया |
वे अविलम्ब दीक्षा लेना चाहते थे |
उनके दो काम करणीय थे -
१. अपनी धर्मपत्नी ( मेरी बहन ) को संयम पथ में सहयात्री बनाने के लिए तैयार करना |
२. बहन केसर का विवाह करना |
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मेरी बहन ने कहा- मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं, 
क्या पढाई के बिना मेरी दीक्षा हो सकती है ?
हीरालाल जी ने पूरी दृढ़ता के साथ कहा-
" दीक्षित होने के लिए शिक्षा की अनिवार्यता नहीं है |"
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पर बहन लाड भीतर ही भीतर अक्षर-ज्ञान कर पुस्तक पढ़ने का अभ्यास करने लगी |
हीरालालजी उसे पढाने में सहयोगी बने |
हीरालालजी की साधना गृहस्थ जीवन में अच्छे ढंग से चल रही थी |
इसी बीच वे अस्वस्थ हो गए |
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विवाह के ६ वर्ष बाद उनका निधन हो गया |
बहन पर आकस्मिक वज्रपात हुआ |
किसी के पास कोई उपाय नहीं था |
उस स्थिति में साध्वियों ने बहन को आध्यात्मिक संबल दिया |
उससे मन आश्वस्त हुआ |
उपयुक्त सिंचन पाकर पति द्वारा बोया गया वैराग्य का बीज अंकुरित हो गया |
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उस घटना के ४ महीने बाद मां बहन को पूज्य कालूगणी के दर्शन कराने ले गई |
उसकी तीव्र भावना देखकर गुरुदेव ने साधना को पुष्ट करने और धार्मिक अध्ययन करने की प्रेरणा दी |
पर बहन की आंख में छाया-सी होने के कारण दीक्षा का प्रसंग टल गया था |
इस बात का मोहनलालजी के मन में पूरा विचार था |
ऐसी स्थिति में बहन की दीक्षा का आश्वासन उन्हें लाडनूं बुलाने का सबसे सरल उपाय था |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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