मेरा गांव - लाडनूं
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मेरा जन्म लाडनूं नाम के उस कस्बे में हुआ,
जो न बड़ा शहर है और न एकदम छोटा गांव |
न साधनों की बहुलता और न उनका सर्वथा अभाव |
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जो न बड़ा शहर है और न एकदम छोटा गांव |
न साधनों की बहुलता और न उनका सर्वथा अभाव |
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मेरा बचपन ऐसे समय में बीता जब विज्ञान का विकास नहीं था |
मेरे जन्मकाल ( २० अक्टूबर १९१४ ) के आसपास लाडनूं में रेलगाड़ी अवश्य थी,
पर वह बहुत छोटी थी |
उसमें केवल चार डिब्बे थे |
मैं एक-दो बार से अधिक रेल की यात्रा नहीं की |
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लाडनूं राजस्थान में नागौर जिले के
मेरे जन्मकाल ( २० अक्टूबर १९१४ ) के आसपास लाडनूं में रेलगाड़ी अवश्य थी,
पर वह बहुत छोटी थी |
उसमें केवल चार डिब्बे थे |
मैं एक-दो बार से अधिक रेल की यात्रा नहीं की |
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लाडनूं राजस्थान में नागौर जिले के
उत्तरी-पूर्वी छोर पर बसा हुआ एक क़स्बा है |
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इसका अस्तित्व महाभारत काल से माना जाता है |
प्राचीन काल में इसका नाम चंदेरी था |
कालांतर में लाडनूं हो गया |
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( तेरापंथ धर्म संघ के चौथे आचार्य ) जयाचार्य
प्राचीन काल में इसका नाम चंदेरी था |
कालांतर में लाडनूं हो गया |
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( तेरापंथ धर्म संघ के चौथे आचार्य ) जयाचार्य
माणकगणी को दीक्षा देने पीरांजी के चबूतरे पर गए थे |
वहां एक बावड़ी थी,
जो माणक बावड़ी कहलाती थी |
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वहां एक बावड़ी थी,
जो माणक बावड़ी कहलाती थी |
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लाडनूं के दर्शनीय स्थलों में यहां के कुछ मंदिर भी हैं |
दिगंबर जैनों के एक मंदिर में सरस्वती की
दिगंबर जैनों के एक मंदिर में सरस्वती की
सुन्दर और कलात्मक दुर्लभ प्रतिमा है |
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यहां जैनों की बस्ती भी बहुत लंबे समय से है |
१००० वर्ष पहले आबाद हुए कस्बे की बसावट को
१००० वर्ष पहले आबाद हुए कस्बे की बसावट को
उस युग के हिसाब से बहुत व्यवस्थित माना जा सकता है |
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जहाँ जैनों की बस्ती है, वहां जैन ही जैन है |
इसी प्रकार महाजन, अग्रवाल, सेवग,
जहाँ जैनों की बस्ती है, वहां जैन ही जैन है |
इसी प्रकार महाजन, अग्रवाल, सेवग,
ब्राह्मण, मुसलमान आदि कौमों को भी सघनता से बसाया गया है |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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