Friday, August 24, 2012

८. मेरी मां - प्रेरणा


मेरी मां - प्रेरणा 
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मां का एक सपना था -
हम सब भाई-बहन व्यसनमुक्त रहे |
मां की प्रेरणा और साध्वियों के नियमित संपर्क से 
हमारे जीवन में किसी प्रकार की बुराई नहीं आई |
मादक और नशीली चीजों की तो बात ही क्या,
हमें चुरी-सुपारी तक खाने की आदत नहीं थी |
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चाय का जहां तक सवाल है,
उस समय तक देश में उसका विशेष प्रचलन नहीं था |
 मां की यह भी प्रेरणा रहती कि हमारा संपर्क अच्छे बच्चों से रहे |
उनकी इस प्रेरणा का परिणाम था कि मैं कुसंग से बराबर बचता रहा |
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कुछ व्यक्ति पदार्थनिष्ठ होते हैं |
वे खाने-पीने, पहनने-ओढने पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर लेते हैं |
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मां इन बातों में रस नहीं लेती थी |
तपस्या में उनकी नैसर्गिक अभिरुचि थी |
उन्होंने १६ तक लड़ी पूरी कर ली |
दस प्रत्याख्यान, २५० प्रत्याख्यान, तीर्थंकर की लड़ी, धर्मचक्र, 
सावन- भाद्रपद महीनों में एकांतर आदि उपक्रम नियमित रूप से चलते थे |
छुटपुट त्याग-प्रत्याख्यान के अतिरिक्त मां ने चारों स्कंध उठा लिए थे -
अब्रह्म्चर्य, रात्रिभोजन, सचित्त और हरियाली का त्याग कर लिया था |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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