Friday, August 24, 2012

२५ . मेरे ज्येष्ठ भ्राता - दीक्षा की प्रेरणा

मेरे ज्येष्ठ भ्राता - दीक्षा की प्रेरणा 
---
दीक्षा के बाद मुनि चम्पालालजी ने एक दिन अनायास ही मुझे पूछा -
" तुलसी ! तेरी दीक्षा लेने की भावना है क्या ?"
मैंने स्वीकार किया कि
मैं दीक्षित होकर गुरुदेव के चरणों में रहना चाहता हूं |
---
उसके बाद उन्होंने मेरी दीक्षा के लिए तीव्र प्रयत्न किया |
मुनि मगनलालजी से मेरा परिचय कराया |
मां वंदनांजी की उनसे बातचीत करवाई |
मुनि मगनलालजी के माध्यम से ही हम दोनों को गुरुदेव से परिचित करवाया |
---
गुरुदेव और मुनि मगनलालजी की पूर्णरूप से अनुकूलता देखकर
उन्होंने मन ही मन यह तय कर लिया कि
' तुलसी ' की दीक्षा इसी समय और यहीं हो जानी चाहिए |
---
मैं स्वयं जल्दी-से-जल्दी दीक्षित होने के लिए उत्सुक था |
गुरुदेव की पूरी मर्ज़ी थी |
कठिनाई एक ही थी -
मोहनलालजी ( बड़े भाई ) वहां नहीं थे |
---
दीक्षा के बाद भी मेरी विकास यात्रा में और 
संघीय दायित्व संभालने के पश्चात संघीय गतिविधियों में 
उनका पूरा-पूरा योगदान मिलता रहा |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

No comments:

Post a Comment