मेरे ज्येष्ठ भ्राता
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हम ६ भाई थे |
छहों भाइयों में मैं सबसे छोटा था |
चौथे भाई चम्पालालजी एक प्रकार से मेरे गार्जियन थे |
वे मेरा बहुत ध्यान रखते थे |
मुझे गोदी में लेकर घुमाते |
गीले आँगन में पैर रखना मुझे प्रारम्भ से ही अच्छा नहीं लगता था |
कभी घर का आंगन गीला होता और मातुश्री बुलाती तो मैं कह देता -
" मां ! मैं तेरे पास कैसे आऊं, मेरे पांव छी: छी: ( गंदे ) हो जायेंगे |"
तब बड़े भाई चम्पालालजी मुझे हाथों में उठाकर गोदी में लेते
और मां के पास पहुंचा देते |
बड़ी बहिन लाडांजी के पति-वियोग की दु:खद घटना ने उनको संसार से विरक्त कर दिया |
फिर एक हादसा हुआ |
हमीरमलजी कोठारी ( मां के चाचा ) के पुत्र चैनरूपजी मौत के मुंह में पहुंचकर बाल-बाल बचे |
उस घटना ने जीवन की नश्वरता का विश्वास पुष्ट कर दिया |
पूज्य गुरुदेव कालूगणी लाडनूं पधारे |
दीक्षा की प्रार्थना की गई |
वि.स. १९८१, चुरू चातुर्मास्य में उनकी दीक्षा हो गई |
हम ६ भाई थे |
छहों भाइयों में मैं सबसे छोटा था |
चौथे भाई चम्पालालजी एक प्रकार से मेरे गार्जियन थे |
वे मेरा बहुत ध्यान रखते थे |
मुझे गोदी में लेकर घुमाते |
गीले आँगन में पैर रखना मुझे प्रारम्भ से ही अच्छा नहीं लगता था |
कभी घर का आंगन गीला होता और मातुश्री बुलाती तो मैं कह देता -
" मां ! मैं तेरे पास कैसे आऊं, मेरे पांव छी: छी: ( गंदे ) हो जायेंगे |"
तब बड़े भाई चम्पालालजी मुझे हाथों में उठाकर गोदी में लेते
और मां के पास पहुंचा देते |
बड़ी बहिन लाडांजी के पति-वियोग की दु:खद घटना ने उनको संसार से विरक्त कर दिया |
फिर एक हादसा हुआ |
हमीरमलजी कोठारी ( मां के चाचा ) के पुत्र चैनरूपजी मौत के मुंह में पहुंचकर बाल-बाल बचे |
उस घटना ने जीवन की नश्वरता का विश्वास पुष्ट कर दिया |
पूज्य गुरुदेव कालूगणी लाडनूं पधारे |
दीक्षा की प्रार्थना की गई |
वि.स. १९८१, चुरू चातुर्मास्य में उनकी दीक्षा हो गई |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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