Friday, August 24, 2012

१५. मेरा बचपन - कान का परदा

मेरा बचपन - कान का परदा 
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जिस समय में स्कूल में पढता था,
उस समय विद्यार्थी स्लेट-वर्तिका ( पाटी-बरता ) रखते थे |
एक दिन कोई छोटी-सी वर्तिका मेरे हाथ में थी |
मेरे बाएं कान में खुजलाहट होने लगी |
मैंने वर्तिका से कान कुरेदना शुरू किया |
अचानक हाथ से वर्तिका छूट गई और कान में फंस गई |
बहुत चेष्टा करने पर भी वह नहीं निकली |
एक समस्या खड़ी हो गई |
मोहनलालजी को पता लगा |
वे मुझे सुजानगढ़ ले गए |
वहां डाक्टर को कान दिखाया |
डाक्टर ने औजार कान में डालकर वर्तिका निकाल दी |
पर उसके कारण कान का परदा खराब हो गया |
तभी से मुझे बाएं कान से कुछ कम सुनाई देता है |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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