Friday, August 24, 2012

१२. मेरे संस्कारों की पौध - संपर्क

मेरे संस्कारों की पौध - संपर्क 
-----
लाडनूं में वृद्ध व रुग्ण साध्वियों का एक सेवाकेंद्र है |
उस समय की भाषा में वहां रहनेवाली साध्वियों को 
" थाणाथरप " या स्थिरवासिनी कहा जाता है |
---
हमारा घर सेवाकेंद्र के नज़दीक निकट था |
घर में कोई भी खाने की चीज बनती उसकी भावना भाई जाती |
हम प्रायः साध्वियों के आने के बाद ही भोजन करते |
इस प्रकार प्रारम्भ से ही हमारे जीवन में " सुपात्र दान " के संस्कार गहरे हो गए |
---
कभी-कभी मैं उपवास करता था |
उपवास का दिन तो आसानी से बीत जाता,
रात को भूख सताती |
पारणे से पहले साध्वियों के दर्शन करके आने के बाद 
मां सस्नेह राजी-राजी पारणा करा देती |
---
तेरापंथ में मूर्तिपूजा की मान्यता नहीं है |
इसलिए हम बच्चों में मंदिर जाने या 
मूर्तिपूजा करने के संस्कार नहीं थे |
---
मां प्रतिदिन सामायिक करती थीं |
वे हमें व्याख्यान की बातें और कहानियाँ सुनाया करती थी |
---
हमारे पड़ोस में एक अचक्षु व्यक्ति थे - हजारीमलजी दुगड़ |
हम उनके पास तत्व-ज्ञान की बातें सीखते थे |
---
किसी भी गलत संस्कार वाले लड़कों से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं था |
मां की जागरूकता और सत्सम्पर्क के कारण 
मेरे जीवन में किसी प्रकार का दुर्व्यसन नहीं आया |
संस्कारी जीवन को मैं अपना सौभाग्य मानता हूं |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

No comments:

Post a Comment