ज्ञानयात्रा का प्रथम चरण -
पूज्य गुरुदेव मेरे प्रेरणा स्रोत थे |
मैं जो कुछ पाया है, उनकी कृपा से पाया है |
अनेक साधू-साध्वियों का मेरे प्रति जो आकर्षण बढ़ा,
उसका एक कारण गुरुदेव का अनुग्रह था |
आप अपने दायित्व के प्रति बहुत सजग थे |
जिस समय जो काम उनके जिम्मे रहा,
उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ वह काम किया |
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आचार्य पद का दायित्व सँभालने के बाद
उनके कार्यक्रमों में एक महत्वपूर्ण काम था -
बाल साधुओं का निर्माण | गुरुदेव मेरी प्रत्येक गतिविधि के नियंता थे |
मुझे किस समय क्या करना है ?
अध्ययन किन ग्रंथों का करना है ?
कब पढ़ना है ?
और कब सीखना है ?
किन ग्रंथो को कंठस्थ करना है ?
कब व्याख्यान देना है ?
कब लिखने का अभ्यास करना है ?
कब और किसे पढ़ाना है ?
इत्यादि सभी गतिविधियों के लिए समय-समय पर
गुरुदेव से मार्गदर्शन मिलता रहता था |
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इसलिए मुझे अपने बारे में कभी किसी प्रकार की चिंता नहीं करनी पड़ी |
गुरुदेव का दृष्टिकोण था कि
बचपन में अधिक समझने की स्थिति नहीं होती |
उस समय कंठस्थ करने में सुविधा रहती है |
इसी कारण गुरुदेव ने कंठस्थ ज्ञान पर बल दिया |
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उस समय पुस्तकें कम उपलब्ध होती थीं,
इसलिए हम हस्तलिखित प्रतियों का बोझ उठाते थे |
गुरुदेव के निर्देश से जो ग्रन्थ याद करते,
उसकी प्रति मिल जाटी तो उसे अपने पास रख लेते |
अन्यथा लिखकर नई प्रति तैयार कर लेते |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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ज्ञानयात्रा का प्रथम चरण
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ग्यारह वर्षों की उस संक्षिप्त यात्रा का प्रमुख विवरण अग्रांकित है :--
* दीक्षा का प्रथम वर्ष - दशवैकालिक, सिन्दूरप्रकर, भक्तामर स्तोत्र,
अभिधानचिंतामणि शब्दकोष आदि |
* दीक्षा का दूसरा वर्ष - भ्रमविध्वंसन के सूत्रपाठ आदि |
* दीक्षा का तीसरा, चौथा वर्ष - सिद्धांतचन्द्रिका आदि |
* दीक्षा का पांचवां वर्ष - प्रमाणनयतत्व लोकालंकार, षड्दर्शन आदि |( रात्रिकालीन उपदेश )
* दीक्षा का छठा वर्ष - गणरत्न महोदधि आदि |
* दीक्षा का सातवाँ वर्ष - भिक्षुशब्दानुशासन के सूत्र | ( बृहदवृत्ति का अध्ययन )
* दीक्षा का आठवाँ वर्ष - आचार्य सिद्धसेनदिवाकर विरचित कल्याणस्तोत्र के द्वितीय चरण को लेकर समस्यापूर्ति के रूप में कालूकल्याण-मंदिर नामक संस्कृत काव्य की रचना |( मध्यान्ह में हरिवंश का व्याख्यान )
* दीक्षा का नौवां वर्ष - भ्रमविध्वंसन निर्युक्ति सहित, शांतिनाथ महाकाव्य और षड्दर्शनसमुच्चय की हरिभद्रसुरि लिखित टीका का वाचन, कालूकौमुदी का अध्यापन तथा राम चरित्र का कंठीकरण | ( मध्यान्हकालीन व्याख्यान
* दीक्षा का दसवां वर्ष - हेमशब्दानुशासन व्याकरण का आठवाँ अध्याय ( प्राकृत व्याकरण ) उणादि पाठ, धातु पाठ आदि |
* दीक्षा का ग्यारहवां वर्ष - मालवा यात्रा में मध्यान्ह एवं रात्रि में व्याख्यान | गंगापुर चातुर्मास्य में सावन महीने से रामचरित्र का वाचन |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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ज्ञानयात्रा का प्रथम चरण
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जब मैं विद्यार्थी था,
तभी से गुरुदेव ने साधुओं को पढाने का दायित्व दे दिया |
मुझे अनुभव हुआ कि गुरुदेव जिस व्यक्ति का विश्वास करते,
पूरा करते |
अध्यापन के मामले में उन्होंने मेरा जितना विश्वास किया,
उससे मैं स्वयं चकित था |
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मेरे लिए वह सहज रूप में विकास का पथ
प्रशस्त करने वाला प्रयोग सिद्ध हुआ |
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राजस्थान में एक कहावत है -
" ज्ञान कंठा दाम अंटां "
पैसा पास में हो तो वांछित वस्तु का क्रय किया जा सकता है |
इसी प्रकार ज्ञान कंठस्थ हो तो उसका
यथेष्ट उपयोग करने से कहीं भी रुकावट नहीं होती |
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महावीर-निर्वाण की एक सहस्राब्दी तक
जैन आगम कंठस्थ परम्परा से ही सुरक्षित रहे थे |
गुरुदेव इस पर बहुत बल देते थे |
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इसी कारण आगम, दर्शन, साहित्य, व्याकरण, शब्दकोष, थोकड़े,
व्याख्यान आदि कंठाग्र करने में मेरी अभिरुचि बनी रही |
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अपने विद्यार्थी जीवन के ग्यारह वर्षों में लगभग २०००० श्लोक
परिमित ग्रन्थ याद करवा कर गुरुदेव ने मुझपर बहुत उपकार किया |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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ज्ञानयात्रा का प्रथम चरण -
कंप्यूटर और केलकुलेटर के इस युग में
नई पीढ़ी के साधू-साध्वियों को सीखने और
नियमित स्वाध्याय की प्रेरणा मिले,
इस दृष्टि से मेरे द्वारा कंठस्थ किए गए
ग्रंथों की सूची दी जा रही है -
१. आगम
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आवश्यक
दशवैकालिक
उत्तराध्ययन
नन्दी
बृहत्कल्प
आयारो
प्रश्नव्याकरण ( संवरद्वार )
२. तात्विक ग्रन्थ
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पचीस बोल
पानां री चरचा
पचीस बोल री चरचा
तेरा द्वार
बासठियो
कर्म प्रकृति
गतागत
अल्पाबोत
संजया
नियंठा
कायस्थिति
लघुदंडक
बावनबोल
गमा
विरह्द्वार
सीझै द्ववार
बंधी शतक
भ्रमविध्वंसन
३. चौपी आदि ( विस्तृत विवरण उपलब्ध है )
४. व्याख्यान आदि ( विस्तृत विवरण उपलब्ध है )
५. संस्कृत ग्रन्थ ( विस्तृत विवरण उपलब्ध है )
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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