मेरी मां - श्रद्धा-भक्ति
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मेरी मां को अक्षर-ज्ञान भी नहीं था,
फिर भी उन्हें सैकड़ों पद्द याद थे |
आराधना, चौबीसी की ढालें, स्वामी भीखणजी की
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मेरी मां को अक्षर-ज्ञान भी नहीं था,
फिर भी उन्हें सैकड़ों पद्द याद थे |
आराधना, चौबीसी की ढालें, स्वामी भीखणजी की
अनेक ढालें उन्हें कंठस्थ याद थी |
पक्खी के दिन नियमित प्रतिक्रमण करती थी |
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पक्खी के दिन नियमित प्रतिक्रमण करती थी |
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इस युग की पढ़ी-लिखी महिलाएं पुस्तकों की सुविधा
के बावजूद इतने थोकड़े याद नहीं कर पाती |
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पढ़ना न आने पाने पर भी उस ज़माने की महिलाएं
आवश्यक तत्वज्ञान सीखकर कंठस्थ कर उसे भूलती नहीं थी |
क्योंकि वे पौ फटने से पहले उठ जाती थी |
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आवश्यक तत्वज्ञान सीखकर कंठस्थ कर उसे भूलती नहीं थी |
क्योंकि वे पौ फटने से पहले उठ जाती थी |
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उनके मन में साध्वियों के प्रति जितनी श्रद्धा-भक्ति थी,
साध्वियों के मन में भी उनका उतना ही स्थान था |
साध्वियां कहा करती कि मोहन की मां का घर
साध्वियों के मन में भी उनका उतना ही स्थान था |
साध्वियां कहा करती कि मोहन की मां का घर
साधू-साध्वियों के लिए बहुत साताकारी है |
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ऎसी बात सुनकर मां को कभी अहंकार नहीं आया |
वे यही अनुभव करती रहीं कि
साध्वियों की उनपर बड़ी कृपा है |
वे यही अनुभव करती रहीं कि
साध्वियों की उनपर बड़ी कृपा है |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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