Friday, August 24, 2012

३१. मेरी दीक्षा का आदेश

मेरी दीक्षा का आदेश - १
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मोहनलालजी जिस दिन लाडनूं पहुंचे थे,
मैंने उनको प्रणाम किया था |
उन्होंने मेरी ओर स्नेहिल नज़रों से नहीं देखा |
मुझे कुछ अटपटा-सा लगा |
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जब कभी वे लाडनूं आते थे, मुझे बहुत स्नेह देते थे |
मैं उनकी कठोर दृष्टि झेलने में असमर्थ होकर वहां से जाने लगा
तो उनकी डांट भी सुनने को मिली |
उन्होंने मुझे चेतावनी देते हुए कहा -
" अब दीक्षा की बात की तो इस घर में रहने को स्थान नहीं मिलेगा |"
मैं प्रारम्भ से ही उनसे डरता था |
इन शब्दों ने तो मुझे स्तब्ध ही कर दिया |
उस दिन के बाद मैं उनके सामने जाने से बचता रहा |
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एक दिन अचानक मोहनलालजी मेरे पास आए |
मुझे कल्पना भी नहीं थी कि वे इस प्रकार मेरे पास आ सकते हैं |
कुछ क्षण वे मेरी ओर देखते रहे |
फिर धीरे से बोले -
" तुलसी ! तेरी क्या इच्छा है ?
क्या तू सचमुच दीक्षा लेगा ?
तुने पक्का सोच लिया है ?
अपने आपको तोल लिया है ?
साधू जीवन कोई खेलतमाशा नहीं है |
इस विषय में तू एक बार पुनः चिंतन कर |"
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मोहनलालजी के आत्मीय भरे मधुर शब्दों को सुनकर मेरा भय कुछ कम हुआ |
मैं सहमत हुआ बोला -
" भाईजी ! मेरा विचार पक्का है |
मैंने अपने आपको तोल लिया है |
आप मुझे आज्ञा दें | "
मेरी दृढ़ता देखकर भी उनका मन संतुष्ट नहीं हुआ |
उन्होंने कहा -
" तुलसी ! काम बहुत कठिन है |
जल्दबाजी में कोई निर्णय मत कर |
तू अभी क्या समझता है ?
तुने देखा ही क्या है ?
हमने इतना संसार देख लिया, पर वैराग्य नहीं हुआ |
तू इतना छोटा है |
तुझे वैराग्य कैसे हो गया ?
दीक्षा कोई ननिहाल तो है नहीं, जब इच्छा हुई चले गए और जब चाहा लौट आए |
यह तो जिंदगी भर लोहे के चने चबाना है |
इस विषय में तू पूरी गंभीरता के साथ एक बार और सोच | "
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गुरुदेव प्रवचन कर रहे थे |
मोहनलालजी भी वहां सामायिक कर रहे थे |
मैं पूज्य गुरुदेव के निकट पहुंचा |
वंदना और चरण-स्पर्श कर मैंने कहा -
" गुरुदेव ! मुझे कुछ चीजों के त्याग करा दें |"
उस समय मैं हज़ारों-हज़ारों आंखों का केंद्र बन गया |
गुरुदेव ने पूछा -
" क्या त्याग कर रहा है ?
मैंने निवेदन किया -
"मैं जीवन भर विवाह करने का तथा व्यापार के लिए परदेश ( बंगाल आदि )
जाने का त्याग करता हूं |"
मेरी बात सुनकर सभा में सन्नाटा छा गया |
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मोहनलालजी को विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं ऐसी बात कह सकता हूं |
उन्होंने खुली आंखों से मेरी ओर देखा |
सामने मैं ही था |
गुरुदेव ने त्याग नहीं करवाए, मुझे सोचने के लिए समय दिया |
मैंने गुरुदेव की साक्षी से दोनों बातों का त्याग कर दिया |
सभा में गहरी हलचल हो गई,
पर मोहनलालजी कुछ नहीं बोले |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरी दीक्षा का आदेश - २
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तेरापंथ धर्मसंघ में दीक्षा की पद्धति बहुत व्यवस्थित है |
वैरागी का मन मज़बूत हो,
अभिभावकों की आज्ञा हो और
आचार्य दीक्षा देने के लिए तैयार हों,
तब बात आगे बढ़ती है |
प्रवचन सभा में सब लोगों के बीच मैंने दो त्याग किये |
इससे पुरे गांव में यह बार प्रसिद्ध हो चली कि तुलसी दीक्षा लेने वाला है |
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बहन लाड की दीक्षा के बारे में पहले से ही चर्चा चल रही थी |
कुछ व्यक्तियों द्वारा उसकी आंख सदोष होने का प्रश्न फिर उठाया गया |
उस समय आंख की जांच करने का प्रस्ताव सामने आया |
मुनि सुखलालजी और मुनि चम्पालालजी को यह जिम्मेदारी दी गई |
दोनों संत मकान से बाहर आए |
पड़ोस के दुगडों की चबूतरी के नीचे धरती पर
एक गोलाकार वृत्त बनाकर उन्होंने बहन से पूछा -
" इसमें तुझे कुछ दिखाई दे रहा है ? "
उस वृत्त में चींटियां चल रह थी |
बहन ने बता दिया कि यहां चींटियां है |
परीक्षा का विवरण गुरुदेव के पास पहुंचा |
उन्हें विश्वास हो गया कि आंख में कोई ऐसा दोष नहीं है,
जो दीक्षा में बाधक हो |
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सब प्रकार की अनुकूलताएं होने पर भी
मोहनलालजी का मौन मुझे बेचैन कर रहा था |
गुरुदेव की कृपा, मुनि मगनलालजी के चातुर्य तथा
गांव के मान्य लोगों की प्रेरणा से मोहनलालजी भी तैयार हो गए |
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मिगसर शुक्ला पूर्णिमा के दिन वे मां को साथ लेकर खड़े हुए और बोले -
" गुरुदेव ! बहन लाड की भावना कई वर्षों से दीक्षा की है |
तुलसी की भावना भी पक्की है |
आप इन्हें योग्य समझें तो दीक्षा का आदेश देने की कृपा करें |"
गुरुदेव की चिंतन मुद्रा को देखकर मुनि मगनलालजी खड़े हुए |
उन्होंने कहा -
" अन्दाता ! मोहनलालजी ने पूरी समझदारी के साथ अपनी भावना आपके चरणों में निवेदित कर दी है | घर के बच्चों को निकालकर देना कोई कम बात नहीं है | गुरु के प्रति श्रद्धा और विश्वास होने पर ही ऐसी बात कही जाती है |
अब कृपा करानी आपके हाथ में है |"

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरी दीक्षा का आदेश - ३
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पृथ्वीराजजी बरमेचा ने मोहनलालजी का सहयोग किया |
स्थानीय पंच तुलसीरामजी खटेड़ ने भी अनुरोध किया |
गुरुदेव ने सबके सामने मुझसे दो-चार बातें पूछीं |
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उपयुक्त अवसर देखकर उन्होंने पोष कृष्णा पंचमी के दिन
हमें दीक्षित करने की स्वीकृति प्रदान की |
उस समय मैं कुछ बोल नहीं पाया,
पर मुझे जो प्रसन्नता हुई,
उसे मैं आज भी शब्द नहीं दे सकता |
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दीक्षा के लिए पौष कृष्णा पंचमी का निर्णय सकारण था |
पंचमी को पुष्य नक्षत्र का योग था |
गुरुदेव उसी नक्षत्र में मुझे दीक्षित करना चाहते थे
और दीक्षा के तत्काल बाद वहां से विहार करना चाहते थे |
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पौष कृष्णा चतुर्थी का दिन मेरे लिए परिवार के साथ रहने का आखिरी दिन था |
परिजनों में उल्लास और विषाद --
दोनों साथ-साथ दिखाई दे रहे थे |
मेरे मन पर किसी प्रकार की उदासी को कोई असर नहीं था |
मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी |
उसी स्थिति में मेरे हाथों पर मेहंदी लगाईं जा रही थी |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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मेरी दीक्षा का आदेश - ४
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परीक्षा बड़े भाई द्वारा
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पौष का महीना था |
सर्दी काफी तेज थी |
रात्रि के समय मुझे कम्बल ओढ़ाकर सुला दिया गया |
घर में हलचल काफी थी |
मैं समय पर सो गया |
बहन लाड भी वहीँ सोई थीं |
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मोहनलालजी लगभग दस बजे ऊपर आए |
अपनी चारपाई पर बैठकर उन्होंने मेरे मुंह पर से कम्बल हटाई |
मेरे कान के पास मुंह करके बोले -
" तुलसी सो गया या जाग रहा है ?"
मैं - " कौन ! भाईजी ? अभी कैसे आए ?"
मोहनलालजी - " एक जरुरी काम से आया हूं |"
मैं - " कहिये, क्या काम है ?"
मोहनलालजी - " देखो, तुलसी ! कल तुम्हारी दीक्षा होनेवाली है |
साधूजीवन में काफी कठिनाइयां आती रहती है |
तुम्हें पूरी सावधानी से रहना है |
हर कठिनाई को साहस से सहना है |
तुम् अभी बालक हो | वहां कभी भोजन मिलेगा, कभी नहीं मिलेगा |
यात्रा में यह समस्या अधिक बढ सकती है |
छोटी अवस्था के कारण तुम् भूख का कष्ट नहीं सह सकोगे
तो क्या करोगे ?"
मैं - " भाईजी ! मैंने अपने-आपको हर तरह से तोल लिया है |
मैं सब कष्ट सहन कर लूँगा |"
मोहनलालजी - " तुम्हारी दृढता से मैं संतुष्ट हूं |
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मुझे विश्वास है कि मेरा भाई कभी विचलित नहीं होगा |
फिर भी परिस्थितिवश कभी मन दुर्बल हो जाए तो एक व्यवस्था हो सकती है |
देखो, यह सौ रूपये का नोट है |
इसे तुम् अपने पास रख लो |
जब कभी भूख-प्यास का संकट सामने आए, इसका उपयोग कर लेना |"
मैं - " भाईजी ! नोट तो परिग्रह है | साधू इसे अपने पास रख ही नहीं सकता |"
मोहनलालजी - " तुम्हारा कहना बिल्कुल सही है |
साधू को रूपये-पैसे रखने का कल्प नहीं है |
इसीलिए मैं तुम्हें सिक्के नहीं दे रहा हूं |
यह तो कागज़ का नोट है | साधू पुस्तक-पन्ने तो रखते ही हैं |
तुम् भी इसे अपने पूठे में अन्य पन्नों के साथ रख लेना |
दुसरे कागज़ परिग्रह नहीं हैं, तो यह कैसे होगा ?"
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मैं - ( हंसते हुए ) " भाईजी ! कागज़ को नोट है तो क्या हुआ, इसकी कीमत तो सौ रुपया ही है |
फिर यह परिग्रह कैसे नहीं है ? साधू को किसी प्रकार का परिग्रह रखने की छूट नहीं है तो इसे कैसे रखा जा सकता है ?"
मोहनलालजी - " तुलसी ! तू अभी बालक है | इन बातों को तू नहीं समझ सकता |
मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूं | तुम्हारा हितैषी बनकर तुम्हें सुझाव देता हूं कि यह नोट साथ में रख ले |"
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मोहनलालजी की बात सुनकर मुझे बहुत जोर से हँसी आ गई |
हंसने की आवाज़ ने बहन लाड को जगा दिया |
वह हड़बड़ाकर उठ बैठी और बोली -
" किस बात की हंसी आ रही है |"
मैंने कोई उत्तर नहीं दिया तो मोहनलालजी ने सारी बात बता दी |
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सबकुछ सुनकर वह बोली -
" भाईजी ! आपने भी अच्छी परीक्षा ली |"
मोहनलालजी अन्यमनस्क भाव से बोले --
" तुलसी का मन तो अब लोट-पातरों में लगा है |
इसे नोट कैसे अच्छे लगे |"

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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