Friday, August 24, 2012

२३. मेरे पर गुरु का प्रभाव

मेरे पर गुरु का प्रभाव 
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उस युग में आचार्यों के लिए " पूजी म्हाराज ", " अन्नदाता "
जैसे शब्दों का प्रयोग होता था |
मैं जबसे समझने लगा,
पूज्य कालूगणी के लिए ' पूजी म्हाराज ' शब्द ही सुना |
इसलिए मैं इस प्रकरण में उनके लिए इसी शब्द को काम में ले रहा हूं |
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पूजी म्हाराज जब भी लाडनूं में पधारते,
गांव की रौनक बढ जाती |
हम बच्चे उनके आगमन से बहुत खुश होते |
स्कूल से छुट्टी ले लेते |
विशेष रूप से साधू-साध्वियों की ' हाजरी '
के दिन हम पूजी म्हाराज के प्रवास-स्थान पर अवश्य जाते |
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हाजरी की कोई भी बात समझ में नहीं आती,
पर हाजरी का दृश्य देखने का आकर्षण रहता |
हाजरी का वाचन पूरा होने के बाद सब साधू दीक्षा पर्याय के क्रम से खड़े होते,
तब हम उत्कंधर होकर उन्हें देखते |
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वह समय प्रतिष्ठा-प्रधान और प्रदर्शन-प्रधान था |
आभरण-प्रदर्शन का प्रसंग शादी-विवाह या वार-त्यौहार तक सीमित नहीं था |
धर्म-स्थान उसके लिए अच्छा केंद्र था |
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माताएं अपने बच्चों को आकर्षक कपड़े पहनाकर तथा सजा-संवार कर धर्मस्थान में भेजती थी |
महिलाएं स्वयं भी भारी आभूषणों और कीमती वेशभूषा से सज-धज कर प्रवचन सुनने आतीं |
इनके लिए आपसी मेलजोल का स्थान धर्मस्थान ही था |
उनकी चर्चा का विषय भी प्रायः घरेलु था |
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वैवाहिक संबंधों की बातचीत भी वहीँ हो जाती थी |
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि
गार्हस्थ्य सम्बन्धी अनेक कार्यों के लिए धर्मस्थान का खुलकर उपयोग होता था,
किन्तु उस ओर कहीं से कोई अंगुली-निर्देश तक नहीं होता था |
क्योंकि वह एक सामाजिक अपेक्षा थी |
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उस समय महिला समाज में भारी आभूषण पहनने की प्रथा प्रचलित थी |
बहनों के आभूषणों में सोने और मोती का प्रयोग अधिक होता था |
कुछ गहने जड़ाऊ भी होते थे |
चमक-दमक के इस आकर्षण से धर्मोपकरण भी अछूते नहीं रहे |
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मुखवस्त्रिका जैसा उपकरण मलमल या रेशमी कपड़े से बनाया जाता |
उस पर किनारी और मोती लगाने की परंपरा प्रायः सभी क्षेत्रों में प्रचलित थी |
कहीं-कहीं हीरे-पन्ने भी लगाए जाते थे |
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बड़े घरों की महिलाएं धर्मस्थान में जातीं तो
उनके साथ नौकरानियां रहती थी |
घड़ी, आसन आदि साथ में लेकर चलना उन्हीं का काम था |
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उस समय मूलतः ' धुलघड़ी ' का उपयोग होता था |
वह काच की बनती थी |
छोटे डमरू के आकार वाली उस घड़ी एक भाग वाले काच में धुल भरी रहती |
जितने समय में वह दुसरे भाग वाले काच में पहुंचती,
उतने समय में एक सामायिक का काल ( ४८ मिनट )
पूरा हो जाता |
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पूजी म्हाराज, अन्दाताधिराज, गुरुदेव, आचार्य श्री आदि कोई भी शब्द हो
और कोई भी युग हो, उनके प्रति समाज में अपूर्व श्रद्धा का भाव रहता है |
वे समूचे समाज में श्रद्धा के केंद्र होते हैं |
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हर एक व्यक्ति उनसे सीधी बात करने में संकोच करता है |
इस दृष्टि से न कोई प्रतिबन्ध है
और न " पूजी म्हाराज " की ओर से रुकावट होती है |
लोगों का अपना ही संकोच है,
जो उन्हें उनके निकट पहुँचने और बातचीत करने से रोकता है |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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