Friday, August 24, 2012

२. मेरा गांव - भिक्षु स्वामी के चरण स्पर्श


लाडनूं को तेरापंथ के प्रथम आचार्य श्री भिक्षु स्वामी के चरण-स्पर्श का सौभाग्य उपलब्ध है |
वि.स. १८३७ के शेषकाल में वे चुरू जाते समय अपने एक सहयोगी साधू के साथ लाडनूं आये थे |
उस समय उन्होंने सेवगों के वास में प्रवास किया |
यहां से बीदासर, राजलदेसर, रतनगढ़ होते हुए वे चुरू पहुंचे |
वहां से लौटते समय पुनः लाडनूं पधारे
और
रामदेवजी के मंदिर में दो दिन रहे |
यहां तृतीय आचार्य श्रीमद ऋषिराय वि.स. १८८६ में पधारे |
उन्होंने वि.स. १८९८ तथा १९०६ में दो चातुर्मास्य लाडनूं किये |
जयाचार्य ने मुनि अवस्था में यहां चातुर्मास्य किया |
यहां वृद्ध, रुग्ण साध्वियों का सेवाकेंद्र है |
इसका प्रारम्भ जयाचार्य के युग में हुआ |
तेरापंथ का एक विशिष्ट अध्याय लाडनूं में लिखा गया |
सुजानगढ़ में छठे आचार्य श्री माणकगणी का स्वर्गवास हो गया |
वे अपने पीछे किसी उत्तराधिकारी का निर्धारण नहीं कर पाए |
चातुर्मास्य के बाद धर्मसंघ लाडनूं में एकत्रित हुआ |
यहां संघ के सातवें आचार्य (डालगणी ) का नाम घोषित किया गया |

No comments:

Post a Comment