Thursday, September 6, 2012

४०. वात्सल्य के अविस्मरणीय प्रसंग

वात्सल्य के अविस्मरणीय प्रसंग
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आचार्य हेमचंद्र ने भगवान महावीर की स्तुति में
अपने उदगार व्यक्त करते हुए कहा --
भंते ! आपके अन्तःकरण में मेरा स्थान हो,
यह चिंतन स्वाभाविक नहीं है |
क्योंकि आपके करोड़ों भक्त हैं |
आप किसे-किसे स्मृति में रखेंगें ?
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मैं आपको यह निवेदन नहीं करूंगा कि
आपके चित्त में मेरा स्थान रहे |
मेरी प्रार्थना इतनी-सी है कि
आप मेरे अन्तःकरण में विराजमान रहें |
मेरी यह प्रार्थना स्वीकृत हो जाए तो
मुझे अन्य किसी से कुछ भी लेना-देना नहीं है |
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हेमचंद्राचार्य का अनुकरण किया जाए तो
अपने सन्दर्भ में भी मैं ऐसा ही चिंतन करूं |
किन्तु मेरा अनुभव इससे भिन्न है |
पूज्य गुरुदेव मेरे रोम-रोम में रमे हुए थे |
उसी प्रकार उनके मन में भी मेरा विशेष स्थान था |
इसका प्रमाण मुझे समय-समय पर मिलता रहता था |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

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वात्सल्य के अविस्मरणीय प्रसंग
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इस पर मेरा हाथ है !!!
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गंगाशहर !
एक बार रात्रिकालीन प्रवचन संपन्न करके गुरुदेव
अपने प्रवास-स्थल आसकरणजी चोपड़ा की हवेली में पधारे |
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वहां गुरुदेव टहलने लगे |
उनका हाथ मेरे कंधे पर था |
मैं भी उनके साथ-साथ चलने लगा |
उस समय तक वहां बिजली नहीं आई थी |
कमरों में लालटैन या लैम्प जलाकर रखने की परम्परा नहीं थी |
मकान में सघन अंधेरा था |
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गुरुदेव टहलते हुए शयनपट्ट के निकट पहुंचे |
मुनि शिवराजजी बिछौने की व्यवस्था कर रहे थे |
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सहसा मुनि शिवराजजी का हाथ मुझसे टकरा गया |
वे उपालंभ के स्वर में बोले -
" बीच में क्यों खड़े हो ?"
मैं उनसे कुछ कहूं,
उससे पहले ही गुरुदेव बोल उठे -
" शिवराजजी ! ऐसे कैसे बोल रहे हो ?
देखते नहीं, इस पर मेरा हाथ है |"
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पूज्य गुरुदेव का हाथ मेरे कंधे पर था,
यह स्थिति मेरे लिए आह्लाददायक था |
इससे भी अधिक आह्लाद का अनुभव तब हुआ,
जब उन्होंने कहा -
" इस पर मेरा हाथ है |"
गुरु की अकारण कृपा पाकर मैं कृतार्थ हो गया |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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वात्सल्य के अविस्मरणीय प्रसंग
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गुरुदेव हमारी साधना और शिक्षा पर पूरा ध्यान दे रहे थे |
" भक्तामर " और " सिन्दूरप्रकर " के १०० श्लोक याद करके
हमने अपने आपको महापंडित मान लिया |
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कुएं का मेंढक समुद्र के विस्तार को क्या जाने ?
संस्कृत भाषा के काव्यों और
ग्रंथों की गरिमा से हमारा कोई परिचय नहीं था |
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इसलिए हम थोडा-सा ज्ञान प्राप्त करके पंडितमानी बन गए |
सूंठ का गांठिया लेकर पंसारी बन बैठे |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से



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