आशुकविरत्न पंडित रघुनन्दनजी
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चुरू !
वहां के जैन यति रावतमलजी गुरुदेव के उपपात में आए |
यतिजी ने कहा -
आजकल चुरू में संस्कृत के एक धुरंधर विद्वान आए हुए हैं,
वे कागज़ और कलम हाथ में लिए बिना ही संस्कृत के
सौ-सौ श्लोकों की रचना कर बोल देते हैं |
उनका नाम है - -
पंडित रघुनन्दन शर्मा |
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यतिजी की बात सुनकर गुरुदेव को विस्मय तो हुआ,
पर पूरा विश्वास नहीं हुआ |
उन्होंने कहा -
यतिजी ! आप भी कैसी बात कर रहे हैं ?
आज के युग में ऐसे विलक्षण विद्वान कहां मिलते हैं ?
सूंठ का एक गांठिया लेकर पंसारी बनने वाले लोग बहुत हैं |
थोड़े से ज्ञान को प्राप्त कर अहंकार में बढ़-चढ़ कर बात करने वाले पंडित मिल जाते हैं |
किन्तु गंभीर ज्ञान रखने वाले खोजने पर भी कम ही दिखाई देते हैं |
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गुरुदेव की स्वीकृति पाकर यतिजी पंडित रघुनन्दनजी के पास जाकर बोले -
" पंडितजी ! यहां एक प्रभावशाली जैन आचार्य आए हुए हैं |
आपको उनसे मिलना चाहिए |"
पंडितजी ने उत्तर दिया -
" मैं जैन संतों के पास नहीं जाऊँगा |
जैन साधू विद्दा प्रेमी नहीं होते |
उनमें तो कोई विद्वान है नहीं,
वे विद्वानों का सम्मान भी नहीं करते |
एक बात - -
उनके बारे में यह यह भी सुनी है कि
वे स्वच्छता नहीं रखते |
न तो वे स्नान करते हैं और
न कपड़े धोते हैं |
ऐसे साधुओं के पास मैं कभी नहीं जाऊँगा |
उनके प्रति मेरे मन में कोई आकर्षण नहीं है |"
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यतिजी ने पंडितजी को समझाते हुए कहा -
" पंडितजी ! मैं आपके बारे में बहुत कुछ कहकर आया हूं |
आप वहां नहीं जायेंगे तो मैं झूठा पड़ जाऊँगा |"
पंडितजी इस शर्त पर राजी हुए कि
वे जैन साधुओं के सामने हाथ नहीं जोडेंगे और
वहां बैठेंगे भी नहीं |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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आशुकविरत्न पंडित रघुनन्दनजी
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यति रावतमलजी पंडितजी को लेकर के साथ कक्ष में प्रविष्ट हुए |
पंडितजी की आंखों पर संदेह का कुहासा था |
वे अनिमिष दृष्टि से गुरुदेव की ओर देखने लगे |
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गुरुदेव ने अमृतमयी नज़रों से उनको निहारा |
पंडितजी को मौन खड़े देखकर गुरुदेव ने
उनसे संस्कृत भाषा में कुछ प्रश्न किये |
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गुरुदेव के शब्दों ने पंडितजी पर जादू-सा कर दिया |
वे अनायास ही बद्धांजलि हो गए |
" मैं जैन साधुओं के सामने हाथ नहीं जोडूंगा |"
- पंडितजी का यह संकल्प टूट गया |
मैं वहां बैठूँगा नहीं,
यह बात भी विस्मृत हो गई |
पंडितजी गुरुदेव के सामने बैठ गए |
उन्होंने काफी देर तक बातचीत की |
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पंडितजी की भ्रान्ति दूर हो गई |
उनके मन पर इतना प्रभाव पड़ा कि
वे प्रथम बार के संपर्क से ही गुरुदेव के भक्त बन गए |
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पंडितजी के लिए वह समय प्रसाद और
विषाद की मिश्रित प्रतिक्रिया का समय था |
उन्होंने गुरुदेव के दर्शन की प्रेरणा पाकर जो कुछ कहा था,
उसके स्मरण से खिन्न वे खिन्न हो गए |
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अपनी भूल के प्रायश्चित्त स्वरुप उन्होंने
आशुकविता के रूप में 'साधुशतकम' की रचना की |
उन्होंने गुरुदेव से निवेदन किया -
" आचार्यजी ! मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत हूं |
आपके संघ में मेरा कुछ भी उपयोग हो तो
मैं अपना सौभाग्य समझूंगा |"
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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आशुकविरत्न पंडित रघुनन्दनजी
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गुरुदेव ने उनसे पूछा कि
क्या वे तेरापंथी साधुओं की ज्ञानाराधना में सहयोगी बन सकते हैं ?
उन्हें संस्कृत व्याकरण, साहित्य आदि
पढाने में अपना समय लगा सकते हैं |
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विद्यादान का सिलसिला शुरू हुआ |
उसके बाद वे प्रतिवर्ष कुछ समय लेकर
गुरुदेव की उपासना में आते और
साधू-साध्वियों को संस्कृत पढ़ाते |
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यह क्रम बहुत लंबे समय तक चला |
तेरापंथ श्रावकों की एक विशेषता है --
संघ और संघपति के प्रति समर्पण |
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उनको जब ज्ञात हो जाता है कि
अमुक व्यक्ति धर्मसंघ के लिए उपयोगी है,
वे उसे सिर-आंखों पर बिठा लेते हैं
उसके साथ वे इतना घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं कि
वह एक तरह से उनके परिवार या समाज का सदस्य बन जाता है |
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उनको गुरु का इंगित मिलना चाहिए,
फिर वे उस व्यक्ति को इतना आत्मीय बना लेते हैं कि
उसकी कठिनाई को अपनी कठिनाई मानकर
उसका हल खोज निकालते हैं |
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तेरापंथी श्रावकों की शासनभक्ति ने पूज्य गुरुदेव के
कुछ सपनों को साकार करने में सक्रिय भूमिका निभाई |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
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