Wednesday, September 26, 2012

४२. मेरा प्रमाद और गुरु-कृपा

मेरा प्रमाद और गुरु-कृपा 
---
छोटी उम्र में भी मैं सहज रूप में गंभीर था |
कभी-कभी बाल सुलभ चपलता भी रंग दिखाती थी |
जब कभी मेरी इस प्रकार की प्रवृत्तियां गुरुदेव के ध्यान में आती,
तत्काल अनुशासनात्मक कार्यवाही हो जाती थी |
---
गुरुदेव द्वारा की गई कार्यवाही से एक बार मन खिन्न होता था |
पर कुछ समय बाद अनुभव होता कि
उनका प्रत्येक आदेश-निर्देश मेरे लिए जीवन-निर्माणकारी बोधपाठ है |
 
---
सुजानगढ़ !
पंचमी समिति के लिए मैं गुरुदेव के साथ जाता था |
वहां बालू के टीले थे |
मैं टीले से सीधा उतरने लगा |
---
गुरुदेव ने मेरी ओर इंगित कर के कहा -
" तुलछु ! आज टीले से सीधा कैसे उतर रहा है ?
इर्यासमिति इसी को कहते हैं क्या ?
नीचे हरियाली होगी तो ?"
---
मुझे अपनी भूल स्वीकार कर लेनी चाहिए थी
और तत्काल निवेदन करना चाहिए था कि
गुरुदेव ! मेरा प्रमाद हो गया |
पर मैंने गुरुदेव की बात का प्रतिवाद करते हुए कहा -
" गुरुदेव ! नीचे हरियाली नहीं है |"
---
गुरुदेव चाहते तो उस अविनय के लिए उसी समय मुझे दण्डित कर सकते थे |
किन्तु यह उनकी महानता थी कि वे मौन रहे |
संयोग से गुरुदेव के जाने के रास्ता उसी टीले की तलहटी के निकट से था |
---
उस स्थान पर पहुँचते ही गुरुदेव ने उस स्थान को ध्यान से देखा और मुझे संबोधित कर कहा -
" तुलछू ! देख, यहां पर हरियाली है या नहीं ?
तुम् जिस ढंग से टीले से उतर रहे थे,
तुम्हारे पैरों से रौंदी गई धुल कहां गिरती ?
तुमने आज दो गलतियाँ की |
पहली गलती देखकर नहीं चलना और
दूसरी गलती अपने प्रमाद को प्रमाद नहीं मानना |"
गुरुदेव का कथन यथार्थ था |
मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था |
मेरी जुबान अटक गई |
गुरुदेव ने मुझे प्रायश्चित स्वरुप कुछ दण्ड दिया |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
-----------------------------------------------
मेरा प्रमाद और गुरु-कृपा
---
चिड़िया उड़ानी है क्या ?
----
राजलदेसर !
प्रतिक्रमण संपन्न कर मैं गुरुदेव को वंदना करने गया |
रात का समय होने से मैं रजोहरण से प्रमार्जन करता हुआ वहां गया था |
मुनि मगनलालजी गुरुदेव के पास बैठे थे |
उन्होंने मुझे संबोधित करके कहा -
" कैसे पूंजता है ?
इस प्रकार चिड़िया उड़ानी है क्या ?
पूंजने की विधि सीखकर ठीक से प्रमार्जन किया कर |"
गुरुदेव स्वयं विराजमान थे |
उन्होंने मुझे कुछ भी नहीं कहा |
उनके सामने मुनि मगनलालजी द्वारा इस प्रकार कहना मुझे अच्छा नहीं लगा |
---
मैंने उनके कथन के प्रति उपेक्षा दिखाते हुए कह दिया -
" मैं ठीक ढंग से प्रमार्जन करके आया हूं |"
बात यहीं समाप्त नहीं हुई |
मैंने उसी समय ज़मीन पून्जकर दिखा दिया और कहा -
" देख लीजिए, मैं अच्छी तरह प्रमार्जन करता हूं या नहीं ?"
---
अब मुझे अनुभव होता है कि
कितना प्रखर था मेरा बचपन |
गुरुदेव को वंदना कर मैं वहां से चला गया |
---
उसके बाद मुनि चम्पालालजी से जो उपालंभ मिला,
उसे मैं आज तक नहीं भूला हूं |
उन्होंने कहा -
" मुनि मगनलालजी आचार्यों की दूसरी देह है |
संघ में उनका बहुत ऊंचा स्थान है |
तुम् उनके सामने कैसे बोले ?
किसके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए ?
यह तुम्हें सीखना पड़ेगा |
हम बराबर के साधु को जो बात नहीं कहते,
वह तुमने उनके सामने कह दी |
तुमने उनसे क्या कहा,
वह तुम्हें याद है क्या ?"
---
वे बोलते रहे और मैं सुनता रहा |
वे मुझे मुनि मगनलालजी के पास ले गए |
उनके निर्देशानुसार मैंने अपनी भूल स्वीकार की और
अज्ञानवश हुए अविनय के लिए क्षमायाचना की |
---
मुनि मगनलालजी ने उस घटना को सहज रूप में लिया |
पर उनके द्वारा दी गई शिक्षा और मुनि चम्पालालजी के उपालंभ ने
मेरे जीवन में जागृति ला दी |
उस दिन के बाद मैंने प्रमार्जन में गलती नहीं की |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

Sunday, September 9, 2012

४१. अस्वास्थ्य और गुरु-कृपा

अस्वास्थ्य और गुरु-कृपा
----
अस्वस्थता कष्ट का हेतु है, यह एक सामान्य बात है |
अस्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध शरीर के साथ है |
पर उससे मन भी प्रभावित होता है |
---
असातवेदनीय कर्म का उदय होने से व्यक्ति अस्वस्थ बनता है |
किसी भी अशुभ कर्म का उदय हो, उससे व्यथा बढ़ सकती है |
---
किन्तु गुरु का अनुग्रह प्राप्त हो तो
कष्ट की स्थिति में भी आनंद का अनुभव हो सकता है |
यह मेरा अनुभूत सत्य है |
---
मैं जब कभी बीमार होता,
पूज्य गुरुदेव की कृपा इतनी अधिक स्फुरित होती कि
बार-बार बीमार होने की इच्छा जाग जाती |
---
बीमारी के क्षणों में गुरुदेव इतना वात्सल्य उंडेलते कि
उसमें सराबोर होकर मैं सब कुछ भूल जाता |
---
उस समय गुरुदेव कई बार मुझे अपने निकट बुलाते,
नाड़ी देखते, औषधि एवं पथ्य के बारे में निर्देश देते,
स्थिति के उतार-चढ़ाव की पूरी जानकारी लेते तथा
कई बार दिन में भी अपने पास ही सुलाते |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
===================================
अस्वास्थ्य और गुरु-कृपा
---
सरदारशहर !
मेरी भूख बंद हो गई |
उपचार किया गया, पर विशेष लाभ नहीं हुआ |
---
गुरुदेव ने मुझे बुलाकर पूछा -
" क्या हुआ ?"
मैंने निवेदन किया -
" कुछ दिनों से भोजन में रूचि नहीं है |"
---
गुरुदेव ने अपनी तर्जनी और कनिष्ठा --
दो अँगुलियों को उलटे मिलाया |
दोनों अंगुलियां मिल गई |
---
हाथ की उस मुद्रा से उन्होंने मेरे शरीर का कई स्थानों से स्पर्श किया |
उस प्रयोग से खाने की रूचि में थोड़ा अंतर आया |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से


Thursday, September 6, 2012

४०. वात्सल्य के अविस्मरणीय प्रसंग

वात्सल्य के अविस्मरणीय प्रसंग
---
आचार्य हेमचंद्र ने भगवान महावीर की स्तुति में
अपने उदगार व्यक्त करते हुए कहा --
भंते ! आपके अन्तःकरण में मेरा स्थान हो,
यह चिंतन स्वाभाविक नहीं है |
क्योंकि आपके करोड़ों भक्त हैं |
आप किसे-किसे स्मृति में रखेंगें ?
---
मैं आपको यह निवेदन नहीं करूंगा कि
आपके चित्त में मेरा स्थान रहे |
मेरी प्रार्थना इतनी-सी है कि
आप मेरे अन्तःकरण में विराजमान रहें |
मेरी यह प्रार्थना स्वीकृत हो जाए तो
मुझे अन्य किसी से कुछ भी लेना-देना नहीं है |
---
हेमचंद्राचार्य का अनुकरण किया जाए तो
अपने सन्दर्भ में भी मैं ऐसा ही चिंतन करूं |
किन्तु मेरा अनुभव इससे भिन्न है |
पूज्य गुरुदेव मेरे रोम-रोम में रमे हुए थे |
उसी प्रकार उनके मन में भी मेरा विशेष स्थान था |
इसका प्रमाण मुझे समय-समय पर मिलता रहता था |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से

=======================================
वात्सल्य के अविस्मरणीय प्रसंग
---
इस पर मेरा हाथ है !!!
---
गंगाशहर !
एक बार रात्रिकालीन प्रवचन संपन्न करके गुरुदेव
अपने प्रवास-स्थल आसकरणजी चोपड़ा की हवेली में पधारे |
---
वहां गुरुदेव टहलने लगे |
उनका हाथ मेरे कंधे पर था |
मैं भी उनके साथ-साथ चलने लगा |
उस समय तक वहां बिजली नहीं आई थी |
कमरों में लालटैन या लैम्प जलाकर रखने की परम्परा नहीं थी |
मकान में सघन अंधेरा था |
---
गुरुदेव टहलते हुए शयनपट्ट के निकट पहुंचे |
मुनि शिवराजजी बिछौने की व्यवस्था कर रहे थे |
---
सहसा मुनि शिवराजजी का हाथ मुझसे टकरा गया |
वे उपालंभ के स्वर में बोले -
" बीच में क्यों खड़े हो ?"
मैं उनसे कुछ कहूं,
उससे पहले ही गुरुदेव बोल उठे -
" शिवराजजी ! ऐसे कैसे बोल रहे हो ?
देखते नहीं, इस पर मेरा हाथ है |"
---
पूज्य गुरुदेव का हाथ मेरे कंधे पर था,
यह स्थिति मेरे लिए आह्लाददायक था |
इससे भी अधिक आह्लाद का अनुभव तब हुआ,
जब उन्होंने कहा -
" इस पर मेरा हाथ है |"
गुरु की अकारण कृपा पाकर मैं कृतार्थ हो गया |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
===================================
वात्सल्य के अविस्मरणीय प्रसंग
---
गुरुदेव हमारी साधना और शिक्षा पर पूरा ध्यान दे रहे थे |
" भक्तामर " और " सिन्दूरप्रकर " के १०० श्लोक याद करके
हमने अपने आपको महापंडित मान लिया |
---
कुएं का मेंढक समुद्र के विस्तार को क्या जाने ?
संस्कृत भाषा के काव्यों और
ग्रंथों की गरिमा से हमारा कोई परिचय नहीं था |
---
इसलिए हम थोडा-सा ज्ञान प्राप्त करके पंडितमानी बन गए |
सूंठ का गांठिया लेकर पंसारी बन बैठे |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से



Friday, August 24, 2012

३९ मेरी संगीत साधना

मेरी संगीत साधना
---
पूज्य गुरुदेव की संगीत कला में विशेष अभिरुचि थी |
संगीत की आधुनिक विधाओं से उनका परिचय नहीं था |
उन्होंने संगीत का विधिवत प्रशिक्षण भी नहीं लिया था |
फिर भी प्राचीन रागिनियों के श्रेष्ठ संगायक थे |
---
जिस समय वे गाते थे तब ऐसा प्रतीत होता था
मानो कोई अभ्यस्त संगीतज्ञ गा रहा है |
---
संगीत मेरी रूचि का विषय है |
बालकपन से ही मुझे गाने में रस था |
उस समय मेरा गला साफ़ था |
राग बहुत बारीक थी |
मुझे अनुभव होता कि तत्कालीन साधुओं में
मेरा जैसा गला किसी के पास नहीं था |
---
पूज्य गुरुदेव कालूगणी जब कभी गीतों का संगान करते,
मैं उनके साथ गाया करता था |
पर मेरी राग अलग ही रहती |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
============================================
मेरी संगीत साधना
----
छापर !
गुरुदेव गाते, तब मैं साथ-साथ गाता |
---
कुछ भाई गुरुदेव के पास आकर बोले -
" आप रात को गाते हैं, तब आपके साथ कौन गाता है ?
एक बहुत बारीक स्वर, बांसुरी जैसा स्वर दूर-दूर तक सुनाई देता है |"
---
उस समय वास्तव में ही मेरे गले से बहुत बारीक स्वर निकलते थे |
यह स्थिति दो-तीन वर्षों तक रही |
राग को बहुत ऊंची उठाने पर भी स्वर भंग नहीं होता था |
---
छापर के नाहटा बंधुओं के बारे में एक बात प्रसिद्ध थी कि
उनकी नज़र बहुत जल्दी लगती है |
---
मुझे कुछ संतों ने परामर्श दिया -
" तुलसी मुनि ! तुम् यहां गाना बंद कर दो |
इतना सुन्दर गाते हो कि नज़र लग जायेगी |"
---
मैंने उनसे कहा -
" आप चिंता न करें |
मुझे नज़र नहीं लगेगी |
क्योंकि मैं गुरुदेव के साये में रहता हूं |
गुरु का साया सबसे बड़ा सुरक्षा-कवच है |"

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
=================================
मेरी संगीत साधना
---
गुरुदेव की कृपा से मैं बहुत मधुर स्वर में गाता था,
इस कारण कुछ व्यक्ति मुझे
" बंसरी महाराज " कहकर पुकारते थे |
---
मैं बाल साधुओं को पढाता था,
इसलिए कुछ लोग मुझे
" मास्टर महाराज " कहते थे |
---
मेरा प्रत्येक काम कलात्मक था,
रहन-सहन व्यवस्थित था,
परिधान ठीक था,
इस दृष्टि से कुछ लोगों में मेरी पहचान
" शौक़ीन महाराज " इस नाम से हो गई |
---
भगवान महावीर के तीन नाम थे --
वर्धमान,
सन्मति और
महावीर |
ये तीनों नाम सार्थक थे |
---
इसी प्रकार उस समय मेरी गतिविधियों के आधार पर लोगों द्वारा
मैं भी तीन नामों से पुकारा जाने लगा |

- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से