मेरा प्रमाद और गुरु-कृपा
---
छोटी उम्र में भी मैं सहज रूप में गंभीर था |
कभी-कभी बाल सुलभ चपलता भी रंग दिखाती थी |
जब कभी मेरी इस प्रकार की प्रवृत्तियां गुरुदेव के ध्यान में आती,
छोटी उम्र में भी मैं सहज रूप में गंभीर था |
कभी-कभी बाल सुलभ चपलता भी रंग दिखाती थी |
जब कभी मेरी इस प्रकार की प्रवृत्तियां गुरुदेव के ध्यान में आती,
तत्काल अनुशासनात्मक कार्यवाही हो जाती थी |
---
---
गुरुदेव द्वारा की गई कार्यवाही से एक बार मन खिन्न होता था |
पर कुछ समय बाद अनुभव होता कि
उनका प्रत्येक आदेश-निर्देश मेरे लिए जीवन-निर्माणकारी बोधपाठ है |
पर कुछ समय बाद अनुभव होता कि
उनका प्रत्येक आदेश-निर्देश मेरे लिए जीवन-निर्माणकारी बोधपाठ है |
---
सुजानगढ़ !
पंचमी समिति के लिए मैं गुरुदेव के साथ जाता था |
पंचमी समिति के लिए मैं गुरुदेव के साथ जाता था |
वहां बालू के टीले थे |
मैं टीले से सीधा उतरने लगा |
---
मैं टीले से सीधा उतरने लगा |
---
गुरुदेव ने मेरी ओर इंगित कर के कहा -
" तुलछु ! आज टीले से सीधा कैसे उतर रहा है ?
इर्यासमिति इसी को कहते हैं क्या ?
नीचे हरियाली होगी तो ?"
---
" तुलछु ! आज टीले से सीधा कैसे उतर रहा है ?
इर्यासमिति इसी को कहते हैं क्या ?
नीचे हरियाली होगी तो ?"
---
मुझे अपनी भूल स्वीकार कर लेनी चाहिए थी
और तत्काल निवेदन करना चाहिए था कि
गुरुदेव ! मेरा प्रमाद हो गया |
पर मैंने गुरुदेव की बात का प्रतिवाद करते हुए कहा -
" गुरुदेव ! नीचे हरियाली नहीं है |"
---
और तत्काल निवेदन करना चाहिए था कि
गुरुदेव ! मेरा प्रमाद हो गया |
पर मैंने गुरुदेव की बात का प्रतिवाद करते हुए कहा -
" गुरुदेव ! नीचे हरियाली नहीं है |"
---
गुरुदेव चाहते तो उस अविनय के लिए उसी समय मुझे दण्डित कर सकते थे |
किन्तु यह उनकी महानता थी कि वे मौन रहे |
संयोग से गुरुदेव के जाने के रास्ता उसी टीले की तलहटी के निकट से था |
---
किन्तु यह उनकी महानता थी कि वे मौन रहे |
संयोग से गुरुदेव के जाने के रास्ता उसी टीले की तलहटी के निकट से था |
---
उस स्थान पर पहुँचते ही गुरुदेव ने उस स्थान को ध्यान से देखा और मुझे संबोधित कर कहा -
" तुलछू ! देख, यहां पर हरियाली है या नहीं ?
तुम् जिस ढंग से टीले से उतर रहे थे,
तुम्हारे पैरों से रौंदी गई धुल कहां गिरती ?
तुमने आज दो गलतियाँ की |
पहली गलती देखकर नहीं चलना और
दूसरी गलती अपने प्रमाद को प्रमाद नहीं मानना |"
गुरुदेव का कथन यथार्थ था |
मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था |
मेरी जुबान अटक गई |
गुरुदेव ने मुझे प्रायश्चित स्वरुप कुछ दण्ड दिया |
" तुलछू ! देख, यहां पर हरियाली है या नहीं ?
तुम् जिस ढंग से टीले से उतर रहे थे,
तुम्हारे पैरों से रौंदी गई धुल कहां गिरती ?
तुमने आज दो गलतियाँ की |
पहली गलती देखकर नहीं चलना और
दूसरी गलती अपने प्रमाद को प्रमाद नहीं मानना |"
गुरुदेव का कथन यथार्थ था |
मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था |
मेरी जुबान अटक गई |
गुरुदेव ने मुझे प्रायश्चित स्वरुप कुछ दण्ड दिया |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से
-----------------------------------------------
मेरा प्रमाद और गुरु-कृपा
---
चिड़िया उड़ानी है क्या ?
----
राजलदेसर !
प्रतिक्रमण संपन्न कर मैं गुरुदेव को वंदना करने गया |
रात का समय होने से मैं रजोहरण से प्रमार्जन करता हुआ वहां गया था |
मुनि मगनलालजी गुरुदेव के पास बैठे थे |
उन्होंने मुझे संबोधित करके कहा -
" कैसे पूंजता है ?
इस प्रकार चिड़िया उड़ानी है क्या ?
पूंजने की विधि सीखकर ठीक से प्रमार्जन किया कर |"
गुरुदेव स्वयं विराजमान थे |
उन्होंने मुझे कुछ भी नहीं कहा |
उनके सामने मुनि मगनलालजी द्वारा इस प्रकार कहना मुझे अच्छा नहीं लगा |
---
मैंने उनके कथन के प्रति उपेक्षा दिखाते हुए कह दिया -
" मैं ठीक ढंग से प्रमार्जन करके आया हूं |"
बात यहीं समाप्त नहीं हुई |
मैंने उसी समय ज़मीन पून्जकर दिखा दिया और कहा -
" देख लीजिए, मैं अच्छी तरह प्रमार्जन करता हूं या नहीं ?"
---
अब मुझे अनुभव होता है कि
कितना प्रखर था मेरा बचपन |
गुरुदेव को वंदना कर मैं वहां से चला गया |
---
उसके बाद मुनि चम्पालालजी से जो उपालंभ मिला,
उसे मैं आज तक नहीं भूला हूं |
उन्होंने कहा -
" मुनि मगनलालजी आचार्यों की दूसरी देह है |
संघ में उनका बहुत ऊंचा स्थान है |
तुम् उनके सामने कैसे बोले ?
किसके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए ?
यह तुम्हें सीखना पड़ेगा |
हम बराबर के साधु को जो बात नहीं कहते,
वह तुमने उनके सामने कह दी |
तुमने उनसे क्या कहा,
वह तुम्हें याद है क्या ?"
---
वे बोलते रहे और मैं सुनता रहा |
वे मुझे मुनि मगनलालजी के पास ले गए |
उनके निर्देशानुसार मैंने अपनी भूल स्वीकार की और
अज्ञानवश हुए अविनय के लिए क्षमायाचना की |
---
मुनि मगनलालजी ने उस घटना को सहज रूप में लिया |
पर उनके द्वारा दी गई शिक्षा और मुनि चम्पालालजी के उपालंभ ने
मेरे जीवन में जागृति ला दी |
उस दिन के बाद मैंने प्रमार्जन में गलती नहीं की |
- गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी की आत्मकथा
" मेरा जीवन मेरा दर्शन " से